9 Sep 2017

100 से अधिक घुंघरुओं को पैरों में बांधकर किया जाता है कत्थक

भारत के आठ शास्त्रीय* नृत्यों (भरतनाट्यम, कत्थक, कत्थकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, कुटियाट्टम) में कत्थक सबसे प्राचीन माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति उत्तर भारत में हुई। प्राचीन काल में इसे कुशिलव नाम से भी जाना जाता था। ‘कत्थक’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘कथा’ शब्द से हुई अर्थात वह नृत्य जिसमें कथा को थिरकते हुए कहा जाए। कृष्ण, राम और शिव की कथाओं की मनमोहक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति* कत्थक का एक अहम और बड़ा हिस्सा है।
कत्थक के प्रादुर्भाव* के विषय में ठीक-ठाक जानकारी ना तो कत्थक कलाकारों को है, ना ही कत्थक गुरुओं के पास। इस नृत्य में पहले स्थान में राधा-कृष्ण पर आधारित रचनाओं का वर्णन होने के कारण लोग इस नृत्य शैली की उत्पत्ति कृष्ण युग में मानते हैं। कत्थक में कलाकारों को सौ से अधिक घुंघरुओं को पैरों में बांधकर लयबद्ध तरीके से, तबला एवं अन्य वाद्ययंत्रों की ताल के साथ ताल मिलाकर, विभिन्न कथाओं को अपने नृत्य एवं भाव-भंगिमाओं* द्वारा प्रस्तुत करना होता है। शास्त्रीय नृत्य शैलियों में मुद्राओं एवं भाव-भंगिमाओं* का विशेष स्थान होता है। कत्थक में दो भाग प्रमुख हैं, तांडव और लास्य। एक तरफ कृष्ण भाव एवं एक तरफ सखी भाव।

शास्त्रीय नृत्य ना सिर्फ लोगों को आध्यात्म से जोड़ते हैं बल्कि अपनी संस्कृति से भी अवगत कराते हैं। कत्थक के मूल रूप से चार घराने माने गए हैं: 1)- लखनऊ घराना 2)- बनारस घराना 3)- जयपुर घराना और 4)- रायगढ़ घराना

वक्त के साथ नृत्य शैली में परिवर्तन ना करने के कारण रायगढ़ घराने की स्थिति आज चिंताजनक है। उन्नीसवीं सदी में वाजिद अली शाह के काल को लखनऊ घराने का स्वर्णिम काल कहा जाता है। इसी काल में कत्थक में श्रृंगारिकता का प्रभाव पड़ा, जो आज भी इस घराने के नृत्य में देखने को मिलता है। वर्तमान समय में पंडित बिरजू महाराज इस घराने की बागडोर संभाले हुए हैं।

कत्थक के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी सिनेमा ने कत्थक को एक नए रूप में, या कह सकते हैं कि बदलाव के साथ पेश किया। अभिनेत्रियों द्वारा महफिलों में किए गए नृत्य में कत्थक भी शामिल रहा है। ‘फूलों की सेज’ में वैजयंती माला, ‘गोपी कृष्णा’ और ‘पाकीज़ा’ में मीना कुमारी, ‘उमराव जान’ में रेखा, या ‘देवदास’ की माधुरी दीक्षित। फिल्मों ने कत्थक को ना सिर्फ प्रमोट किया बल्कि मंच एवं घराने तक सीमित इस नृत्यशैली को घर-घर तक पहुंचाया।
“कत्थक वो नृत्य शैली है जो हिंदू और मुस्लिम संस्कृति को जोड़ती है। कत्थक की उत्पत्ति कृष्ण काल में मानी गयी, वहींं मुगल काल में इस नृत्य को नए आयाम मिले।”

कई शहरों, जहां नृत्य को सम्मानजनक दृष्टि से नहीं देखा जाता था, वहां भी इस नृत्य शैली की धूम आज देखने को मिलती है। युवाओं में भी इसका शौक सर चढ़कर बोल रहा है। कानपुर की संजना तिवारी होंं या बनारस घराने से जुड़ी कांतिका मिश्रा, आज देश-विदेश में ये कलाकार कत्थक का नाम ऊंचा कर रही हैं।

कत्थक एक ऐसी नृत्य शैली भी है जो हिंदू और मुस्लिम संस्कृति को जोड़ती है। जहां कत्थक की उत्पत्ति कृष्ण काल में मानी गयी है, वहींं मुगल काल में इस नृत्य को नया रूप एवं नए आयाम मिले। कत्थक ना सिर्फ प्राचीन कथाओं को कहने का माध्यम है, बल्कि अपने मन के विचारों की अभिव्यक्ति का भी साधन है। इस बात को चरितार्थ किया एक युवा कत्थक कलाकार अवनी सेठी ने।

अहमदाबाद में विश्व हिंदू परिषद द्वारा दीवारों पर लिखवाए गए स्लोगन ‘हिंदू लड़कियां लव जिहाद से सावधान रहें’ के विरोध में अवनी ने ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाने पर सड़कोंं एवं सार्वजनिक स्थानों (जहां स्लोगन लिखे गए, ठीक उसी के सामने) कत्थक किया। यह उनके विरोध का तरीका था, जिसका ज़रिया उन्होंने कत्थक को बनाया।

यह तो थी कत्थक के पक्ष की बात, अब बात करते हैं इसकी वर्तमान स्थिति की। आज रियलिटी शोज़ के दौर में कत्थक गुमनाम सा होता जा रहा है। अपनी अलहदा सभ्यता एवं संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले हमारे देश में आज जिस मुकाम पर शास्त्रीय नृत्य को होना चाहिए था, दुर्भाग्यवश वह इसके बहुत पीछे है। किसी भी शो में दस पाश्चात्य नृत्यों के बाद, मुश्किल से एक कत्थक प्रस्तुति देखने को मिल पाती है। वर्तमान में कत्थक का हाल बारिश में उगने वाले उस सूरज की तरह हो चला है, जो गाहे-बगाहे बादलों की ओट से देखने को मिल जाता है।

विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर एक ओर जहां फिल्मी हस्तियों को बुलाया जाता है एवं लाखों रुपए दिए जाते हैं, वहीं अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करने वाले कलाकारों को हज़ार भी बमुश्किल ही मिलते हैं।

अगर खोजने जाएं तो ज़्यादातर लोग ना तो कत्थक के बारे में जानते हैं और ना ही उनके कलाकारों के विषय में।

शास्त्रीय नृत्यों के अस्तित्व के संघर्ष की हकीकत को देखते हुए उम्मीद है कि युवाओं की कत्थक में रूचि बढ़ेगी जो शास्त्रीय नृत्यों को उनका असल स्थान दिलवाने में मददगार साबित होगी।

Source - Youth Ki Awaaz

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