अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेम कहानी



अटल बिहारी वाजपेयी. भाजपा का एक जाना पहचाना चेहरा. वो वाजपेयी जिन्होंने 10 से भी ज्यादा दलों के गठबंधन को अपने तईं चला लिया. वो भी पूरे पांच साल. वो अटल जिनके विरोधी भी उनके विरोध में क्या बोलें, ये सोचने पर मजबूर हो जाते थे.

वो अटल जिनसे जब पूछा गया कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की, तो उन्होंने कहा ‘समय नहीं मिला’.

वही अटल जिन्होंने ये भी कहा, ‘शादी नहीं की, लेकिन कुंवारा नहीं हूं’ और हंस दिए.

वो अटल जिन्होंने प्रेम किया, और वो प्रेम भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे ज्यादा सहेज कर रखा जाने वाला एक ऐसा सीक्रेट बन गया जिसके बारे में जानते सब थे. कहता कोई नहीं था. ओपन सीक्रेट कहते हैं न जिसे, वही.

वाजपेयी ने जिनसे प्रेम किया वो थीं राजकुमारी कौल. ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज (आज लक्ष्मीबाई कॉलेज है उसका नाम) में ग्रेजुएशन के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी मिले राजकुमारी हकसार से. उज्जैन में पैदा हुईं, इंडिया गांधी की सेकण्ड कजिन. ये बात अटल बिहारी वाजपेयी को पहले से नहीं पता थी.

उल्लेख एन. पी . की किताब द अनटोल्ड वाजपेयी में ये बात पढ़ने को मिलती है कि वाजपेयी ने राजकुमारी कौल को एक लव लेटर लिखा था. किताब में रख कर छोड़ा था. लेकिन उसका जवाब नहीं मिला उनको. ये चीज़ बाद में पता चली कि राजकुमारी ने भी उनको लव लेटर लिख कर छोड़ा था,वो वाजपेयी को नहीं मिला. तलत ज़मीर इस बात का ज़िक्र करती हैं एक इंटरव्यू में.

वाजपेयी और राजकुमारी की शादी ना हो सकी, राजकुमारी के घरवाले राजी ना हुए थे. उनकी शादी ब्रिज नारायण कौल नाम के प्रोफ़ेसर से हुई जो रामजस कॉलेज में पढ़ाते थे. उनकी दो बेटियां हुईं. नमिता और नम्रता. वो दोनों वाजपेयी को बापजी कहकर बुलाती थीं.

जब वाजपेयी सांसद बने और लुटियंस दिल्ली में उनको घर मिला, तब कौल परिवार उनके साथ रहने आ गया. नमिता की शादी रंजन भट्टाचार्य से हुई, उनकी एक बेटी भी हुई जिसका नाम नेहारिका रखा गया.


कैसी थीं राजकुमारी कौल?

1980 में एक मैगजीन को इंटरव्यू देते हुए राजकुमारी कौल से पुछा गया था उनके और अटल बिहारी वाजपेयी के रिश्ते के बारे में. उन्होंने जवाब दिया था कि उनका और ऊनके पति का रिश्ता इतना मज़बूत है कि वो इन सब बातों पर ध्यान ही नहीं देते.

के. पी. नय्यर द टेलीग्राफ में लिखे अपने लेख में बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तब उनकी गोद ली बेटी नमिता के पति रंजन भट्टाचार्य की बड़ी तूती बोलती थी सत्ता के पावरहाउसेज में. यहां तक कि जब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश दौरे पर जाते थे, उनके साथ नमिता और रंजन हुआ करते थे. वहां पर भी उनके पास फ़ोन आता था, कि वाजपेयी की दवाओं का समय हो गया है. ये फ़ोन बिना नागा राजकुमारी कौल किया करती थीं.

किंशुक नाग ने एक किताब लिखी, अटल बिहारी वाजपेयी- अ मैन फॉर ऑल सीजंस. उसमें उन्होंने बताया है कि उन्होंने सीनियर जर्नलिस्ट पंकज वोहरा से बात की. उन्होंने बताया कि राजकुमारी कौल अटल बिहारी वाजपेयी के घर की धुरी थीं. जब वाजपेयी प्रधान मंत्री बने, तब रामजस कॉलेज के वो लड़के जो उन्हें उनके स्टूडेंट जीवन के समय से जानते थे, वो भी चर्चा में आए. इन लड़कों के ग्रुप को रामजस क्लब भी कहा जाता था. लेकिन ये लोग मिसेज कौल के ज्यादा करीब थे अटल जी की बनिस्बत. उनको पहचान मिली तो मिसेज कौल की वजह से.

एस के दास जो रामजस कॉलेज के छात्र थे 1965 से 1967 तक. वो बाद में IAS अफसर बने, भारत सरकार के सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए. उन्होंने बताया कि प्रोफ़ेसर बी एन कौल रामजस में हॉस्टल के वार्डन थे. बड़े स्ट्रिक्ट थे. शाम को हॉस्टल आ धमकते थे. इस से परेशान हो कर सभी हॉस्टल के लड़कों ने सोचा जाकर मिसेज कौल से बात की जाए. वो पहुंचे बात करने. मिसेज कौल ने बड़े प्यार से वाट की, कहा ‘मेरे पति हॉस्टल चले जाएं तो यहां आ जाया करो. कॉलेज के स्टूडेंट्स थे, सच में हर दूसरी शाम आने जाने लगे. मिसेज कौल उन्हें बड़े प्यार से मिठाई –ठंडाई वगैरह दिया करती थीं. इन लड़कों में शामिल थे एस के दास, अशोक सैकिया, बी पी मिश्रा, और एम एल त्रिपाठी.

गिरीश निकम ने रेडिफ पर लिखे अपने लेख में बताया था कि कैसे वो जब एक नए नवेले जर्नलिस्ट थे तो वाजपेयी को कभी भी फोन घुमा देते थे किसी खबर के लिए. कन्फर्मेशन के लिए. उस समय तक वो प्रधानमंत्री नहीं बने थे. तो फ़ोन उठा लिया करते थे. कभी कभी मिसेज कौल फोन उठाती थीं. एक बार जब मिसेज कौल ने फ़ोन उठाया, तो गिरीश से पूछा, तुम जानते हो मैं कौन हूं ?

गिरीश नहीं जानते थे. उन्होंने ना में जवाब दिया.

मिसेज कौल ने अपना परिचय दिया. बताया कि वो और वाजपेयी कितने गहरे दोस्त हैं. गिरीश से जब तब बात होती, उनको चाय पर बुलातीं. हर बार वो कह देते, आऊंगा. जा नहीं पाए.

2014 में राजकुमारी कौल हमेशा के लिए चली गईं. उनके साथ ही एक ऐसी प्रेम कथा पन्नों के हाशिए पर चली गई जिसका आज की राजनीति, या आने वाले समय में दुबारा अपना बराबरी का ढूंढ पाना बेहद मुश्किल लगता है.

Source - ON 

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