सर्टिफिकेट पर पिता का नाम बदलवाने की मार्मिक कहानी


भारत-बांग्लादेश सीमा पर मौजूद छीटमहल यानी एन्क्लेव में रहने वाले एक हजार युवक-युवतियां अपने पिता का नाम बदलवाने के लिए इन दिनों दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। अब तक स्कूलों में एडमिशन के लिए ये लोग अपने पिता के नाम के तौर पर किसी पड़ोसी या दूर के रिश्तेदार का नाम इस्तेमाल करते थे, क्योंकि इन्हें भारत की नागरिकता हासिल नहीं थी।
दरअसल, 2015 से पहले भारतीय इलाके में कुछ बांग्लादेशी छीटमहल थे। लेकिन यहां रहने वाले 14 हजार से ज्यादा लोगों के पास भारतीय नागरिकता नहीं थी। इसी वजह से वहां के बच्चे पिता की जगह भारतीय इलाके में रह रहे अपने रिश्तेदार का नाम लिखवाकर स्कूल में एडमिशन ले लेते थे। भारत-बांग्लादेश के बीच मौजूद छीटमहलों की 2015 में अदला-बदली हुई। जिन बांग्लादेशी छीटमहलों को भारत में मिला दिया गया, वहां के लोगों को भारतीय नागरिकता दे दी गई। जो भारतीय छीटमहल बांग्लादेश में मिल गए, वहां के लोगों को बांग्लादेशी नागरिकता मिल गई। 




नाम बदलवाना इसलिए जरूरी 
भारतीय सीमा में मिल चुके बांग्लादेशी छीटमहल के 14 हजार लोगों को अब भारतीय नागरिकता मिल गई है। वे चाहते हैं कि स्कूल के सर्टिफिकेट पर अब उनके असली पिता का नाम हो। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि उनके आधार कार्ड और वोटर आईडी पर असली पिता का नाम है और स्कूल के सर्टिफकेट पर फर्जी नाम। अगर नाम नहीं बदला तो उन्हें आगे की पढ़ाई, नौकरी और यहां तक कि पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने में भी परेशानियां आएंगी। 

रहमान अली : सिर्फ इन्हें मिली कामयाबी
अब तक एक हजार में से 800 युवा पिता का नाम बदलवाने के लिए अर्जियां दे चुके हैं। कामयाबी सिर्फ एक को मिली। पिता का गलत नाम सुधरवाने के लिए 26 साल के रहमान अली तीन साल तक अधिकारियों के चक्कर काटते रहे। वे कूच बिहार के दिनहाटा सब डिविजन में रहते हैं। इस साल अप्रैल में उन्हें माध्यमिक बोर्ड ने सुधरे हुए नाम के साथ सर्टिफिकेट जारी किया। उनके जैसे बाकी युवा भी अपने सर्टिफिकेट में पिता का नाम सुधरवाना चाहते हैं। 

सेना में जाने का सपना टूटा
मियां अख्तर ऐसे अकेले युवा नहीं हैं जो सेना में भर्ती होना चाहते थे, लेकिन सर्टिफिकेट्स पर पिता का नाम अलग-अलग होने से डिस्क्वॉलिफाई हो गए। अख्तर कहते हैं कि एन्क्लेव के आसपास मौजूद लोग या रिश्तेदार एक-दूसरे की मदद के लिए बच्चों के सर्टिफिकेट में अपना नाम लिखवाने को दे देते थे। यही नहीं, कई बार स्कूल से बुलावा आने पर वे बच्चे का पिता बनकर टीचर से मिलने भी चले जाते थे। 

डेटाबेस तैयार कर रही सरकार
भारत बांग्लादेश एन्क्लेव एक्सचेंज कोऑर्डिनेशन कमेटी के प्रमुख दीप्तिमान सेनगुप्ता ने इसके लिए 40 साल लड़ाई लड़ी है। वे कहते हैं कि हालात ऐसे हो गए हैं कि युवाओं को न तो नौकरी मिल रही है, न ही वे आगे की पढ़ाई कर पा रहे हैं। सरकार को जल्द ही कोई कदम उठाना चाहिए। कूच बिहार के अधिकारियों के मुताबिक वे छात्रों और युवाओं का एक डेटाबेस तैयार कर रहे हैं। इसमें उन लोगों की लिस्ट होगी, जिनके पिता के नाम फर्जी हैं और जिन्हें बदलवाने की अर्जियां दाखिल हुई हैं। इसके लिए अधिकारी अब बोर्ड को सबूत के साथ चिटि्ठयां लिख रहे हैं।

Source - Dainik Bhaskar 


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