ये भी एक रिकॉर्ड है कि पैदा होते ही बच्ची बोल पड़ी !



इस देश में दस साल की बच्ची को मां बनाकर एक रिकॉर्ड तो कायम कर ही दिया गया है. अब एक रिकॉर्ड और सुन लीजिए. इस बच्ची की नवजात बेटी ने कुछ दो टूक बातें की हैं. ये बातें भी रिकॉर्ड करने लायक हैं...



ये मैं कहां लेटी हूं ?

ये मेरे बगल में कौन है ?

क्या कहा?

ये मेरी मां है !
लेकिन, ये तो मेरी बड़ी बहन जैसी दिख रही है. ये मेरी मां कैसे हो सकती है ?

क्या कहा, इसका रेप हुआ था... और उसी के नतीजे में मैं पैदा हुई हूं ? कहीं मैं भारत में तो नहीं हूं ?

मां मुझे तुझ पर गुस्सा आ रहा है और दया भी. क्योंकि मुझसे पहले तो ये तेरा दुर्भाग्य है कि तू भारत में पैदा हुई. जिस देश में हर 15 मिनट में एक बलात्कार हो रहा है. गुस्सा तो मुझे तेरी मां पर भी आ रहा है. जिसने तुझे बचपन में यह नहीं बताया कि किसी के छूने में हवस को कैसे पहचानें.

हवस से ध्यान आया - वो वहशी कौन था ? सुन रही हूं कि वो तेरा मामा ही था मां ? कहने को ये रिश्तेदार हैं लेकिन ऐसे 7 दरिंदे रोज अपनी ही किसी न किसी रिश्तेदार की जिंदगी से खेल रहे हैं. इनमें से 3 का तो उनसे खून का रिश्ता है. उस मामा को मैं क्या कहूं, जब इसी देश में कहीं न कहीं एक बाप और एक बेटा रोज अपनी ही बेटी या बहन के साथ रेप कर रहे हों ! भारत में 95 फीसदी रेपिस्ट जान-पहचान वाले ही हैं. लेकिन, चिंताजनक ये है कि हर तीसरी वारदात में यह काम एक रिश्तेदार कर रहा है. बेचारगी तो उस बच्ची की है, जो भरोसे का रिश्ता मानकर मामा की गोद में जा बैठी. लेकिन मामा ने मुझे ही उस बच्ची की गोद में ला दिया. शर्मनाक. बेहद शर्मनाक.

ये मेरे सामने जो डॉक्टर साहब खड़े हैं, मैं इनसे भी कुछ कहना चाहती हूं. मुझे कामयाबी से इस दुनिया में लाकर इन्होंने अपने करिअॅर में तो झंडा गाड़ लिया, लेकिन उस समय इन्हें क्या हो गया था, जब मेरी मां पहली बार अपना गर्भ लेकर इनके पास आई थी. जब इन्हें पता था कि यह 10 साल की बच्ची रेप का शिकार हुई है तब उन्होंने मानवता क्यों नहीं दिखाई? डॉक्टर साहब कोर्ट में जाकर क्यों नहीं खड़े हो गए कि दस साल की बच्ची न तो शारीरिक और न ही मानसिक रूप से मां बनने के लिए तैयार होती है. किसी भी परिस्थिति में नहीं. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 भले ही यह कहे कि जब तक गर्भवती की जान को खतरा न हो, वे अबॉर्शन के लिए न कहें. लेकिन, डॉक्टर साहब मेरे इस दुनिया में आने पर अब दो जिंदगियों की हालत मौत से बदतर हो गई है.

...और अब कुछ बातें कोर्ट से भी. क्या जज साहब! आप लोग तो मामले का स्वयं संज्ञान लेने के लिए मशहूर हैं. वाकई न्याह हो सके, इसलिए कई मौकों पर हद से बाहर जाकर आपने मिसालें कायम की हैं. लेकिन रेप की शिकार 10 साल की बच्ची के लिए आपका दिल क्यों नहीं पसीजा. उस निर्दयी कानून का हवाला तो बिलकुल मत दीजिएगा, जिसमें 20 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ को हटाना अपराध माना गया है. अपराध तो यह है कि दस साल की बच्ची का रेप हुआ. अपराध तो यह है कि रेप पीड़ित का मेडिकल टेस्ट हो, और उसे गर्भपात के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ें. कोर्ट दर कोर्ट. मेरी मां के मामले में तो अंतिम फैसला आते-आते गर्भ छह माह का हो गया था. और अब तो मैं खुद भी आ गई हूं. क्या यह मेरे या मेरी मां के साथ न्याय हुआ है? इस न्यात से न मैं खुश हूं और न मेरी मां. बताइए, कोर्ट के मान का क्या हुआ ?

अब कोर्ट कहेगा कि हम तो उसी कानून पर काम करते हैं जो संसद बनाती है. तो आखिरी बात उस संसद से, और उसके सबसे बड़े पदाधिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से. महिलाओं को सुरक्षा देने की कस्में खाकर वोट मांगे जाते हैं. सरकारें बनती हैं. अब लीजिए मैं आ गई हूं इस दुनिया में. तमाम कानून और उसके पहरेदारों के बीच से - और बीच में. बताइए मेरा क्या होगा? मेरी मां तो अब किसी स्कूल में जाने से रही. क्योंकि ऐसे ही एक मामले में रेप पीड़ित को स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था. क्या पता मुझे भी रेप-वाली-लड़की की बेटी बताकर स्कूल से निकाल दिया जाए. कुछ लोग सहानुभूति जताते हुए मुझे गोद लेने की बात कहेंगे, लेकिन एक बात साफ समझ लीजिए कि जब हम अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं तो किसी और की गोद में...?

Source - I Chowk 


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