क्या NOTA वाले वोट भी बीजेपी के खाते में जाएंगे!



दिल्ली में चल रही बीजेपी कार्यकारिणी में अमित शाह ने 2019 में 'अजेय बीजेपी' का नारा दिया है. शाह सहित दूसरे बीजेपी नेताओं ने भी 2019 के चुनाव में 2014 से भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में वापसी का संकल्प दोहराया है. बीजेपी नेताओं को यकीन है, 'संकल्प की शक्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता है.'

भरोसा अच्छी बात है. बगैर भरोसे से कुछ भी नहीं होता. वैसे भी कार्यकर्ताओं में भरोसा बनाये रखने के लिए ऐसी बातें बेहद जरूरी होती हैं. मगर, एक सच ये भी है कि हद से ज्यादा भरोसा हवा में इतना ऊपर उड़ा देता है कि जमीन कब छूट जाती है, पता भी नहीं चलता. बताने की जरूरत नहीं 14 साल पहले अपने शाइनिंग इंडिया का हश्र बीजेपी खुद देख चुकी है.



बीजेपी को पूरा भरोसा है कि राष्ट्रवाद का एजेंडा उसे चुनावी वैतरणी पार करा देगा - और यही वजह है कि एससी-एसटी एक्ट पर मचे बवाल को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह डाउनप्ले कर रहे हैं, "इससे 2019 के चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा."

SC/ST एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश बदलने के खिलाफ देश के कई हिस्सों में आवाज उठ रही है. सवर्णों के भारत बंद की सफलता को बीजेपी चाहे कितना भी कमतर बताने की कोशिश कर रही हो - NOTA की धमकी सभी राजनैतिक दलों की नींद उड़ाने वाली है.
ये नोटा NOTA क्या है?

जिस NOTA को लोग सीधे सीधे जानते हैं, बीजेपी ने अपने हिसाब से उसका भी काउंटर खोज लिया है. असल में तो नोटा के तहत चुनावों में डाले जाने वाले वे वोट होते हैं जो किसी भी उम्मीदवार को नहीं दिये जाते.

EVM में सारे उम्मीदवारों के चुनाव निशान के बाद सबसे आखिर में जो बटन होता है उस लिखा होता है - NOTA. NOTA का मतलब होता है - 'नन ऑफ द अबव' यानी ऊपरवालों में से कोई नहीं.

निश्चित तौर पर बीजेपी इससे परेशान हुई होगी, लेकिन ऐसी चुनौतियों से उबरने की तरकीब निकालने में बीजेपी की कोर टीम माहिर है. बीजेपी के लिए सबसे आसान होता है ऐसी किसी भी चीज या वाकये से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम जोड़ देना. गुजरात चुनाव के दौरान जब विपक्ष का स्लोगन 'विकास पागल हो गया है' हिट होकर मुसीबत बनने लगा तो बीजेपी ने उसे गुजराती अस्मिता से जोड़ दिया और कांग्रेस को पीछे हटना पड़ा था.

बीजेपी की सोशल मीडिया टीम ने फिर से विरोध का काउंटर ढूंढ निकाला है. बीजेपी लोगों को NOTA का नया मतलब समझा रही है - 'नमो वन टाइम अगेन' यानी नरेंद्र मोदी फिर एक बार. बीजेपी की ओर से सोशल मीडिया पर इसका पोस्ट भी देखा जा रहा है. बीजेपी नेता, कार्यकर्ता और समर्थक इसे सोशल मीडिया पर खूब शेयर भी कर रहे हैं.

बीजेपी कार्यकारिणी में अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि पार्टी के पास देश ही नहीं दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता हैं - नरेंद्र मोदी. बेशक, तमाम सर्वे भी मोदी को 2019 में चुनौती देने वालों को लोकप्रियता के मामले में काफी पीछे छोड़ दे रहे हैं. ये भी सही है कि मोदी के बूते ही बीजेपी त्रिपुरा में अरसे से लहरा रहे लाल झंडे की जगह भगवा फहराने में कामयाब रही है. ये भी सही है कि यूपी में बीजेपी ने मोदी के कारण ही सरकार बनायी है - और गुजरात में सरकार बचायी भी है. मगर, एक और सच है कि कर्नाटक से लेकर कैराना तक मोदी का नाम काम नहीं आ सका है. बीजेपी को मालूम होना चाहिये कि हर भैंस एक ही लाठी से नहीं हांकी जा सकती.

सवर्ण समुदाय के भारत बंद के दौरान एक आवाज उठी कि कोटे के खिलाफ नोटा को अख्तियार किया जाये. एससी-एसटी कानून से खुद को पीड़ित के तौर पर पेश करते हुए सवर्ण समाज ने ये आवाज दी - और विपक्ष ने इसे पूरी हवा दी. यूपी, बिहार अलावा जिन दो राज्यों में सवर्णों के बंद का असर दिखा वे हैं - मध्य प्रदेश और राजस्थान. खास बात ये है कि दोनों ही राज्यों में छह महीने के भीतर चुनाव होने जा रहे हैं.
बागी बना बलिया का एक गांव

हर बार चुनाव में मतदान बहिष्कार की खबरें देखने को मिलती रही हैं. अक्सर बिजली, पानी या सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के विरोध में किसी मोहल्ले, गांव या इलाके विशेष के लोग चुनावों का बहिष्कार करते रहते हैं. चुनाव बहिष्कार की ऐसी ही ताजा खबर जम्मू-कश्मीर से भी आ रही है. सूबे के दो प्रमुख दल अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कांफ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी ने पंचायत चुनावों के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है. दरअसल, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी सहित सारी स्थानीय पार्टियां जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेष अधिकार देने वाली धारा 35A से संभावित छेड़छाड़ को लेकर ऐसा कर रही हैं.

यूपी का बलिया जिला आजादी के आंदोलन के दौरान भी बगावत की मिसाल बना था. इस बार बलिया के ही एक गांव के लोग SC/ST एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में खास वोट बैंक खातिर बदलाव का जोरदार विरोध कर रहे हैं. बलिया के सोनबरसा गांव के कुछ नौजवानों ने विरोध प्रकट करते हुए वोट के नाम पर EVM में NOTA का बटन दबाने का ऐलान कर दिया है.

अपने विवादित बयानों को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह पहले से ही विरोध का अलग जगाये हुए हैं. बताते हैं कि सोनबरसा के नौजवानों को भी बीजेपी एमएलए का पूरा सपोर्ट मिल रहा है. कोटा के बदले नोटा वाली ये बहस उस सभी इलाकों में खूब जोर पकड़ रही है जहां जहां सवर्णों के भारत बंद का ज्यादा असर देखा गया. मध्य प्रदेश के सवर्ण सरकारी कर्मचारियों के संगठन तो बीजेपी को बाकायदा सबक सिखाने की तैयारी में जुट गये हैं.

सपाक्स की घोषणा तो नींद उड़ाने वाली है

चुनावों में सरकारी कर्मचारियों की तो ड्यूटी लगी रहती है, फिर भी परोक्ष रूप से हार जीत में उनकी भूमिका खासी अहम मानी जाती रही है. देश में इमरजेंसी लागू होने के दौरान जबरन नसबंदी कराये जाने से नाराज लोगों में सबसे ज्यादा तादाद सरकारी मुलाजिमों की ही थी - और इंदिरा गांधी की हार में उनकी बहुत बड़ी भूमिका देखी गयी.

मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के संगठनों को जातीय आधार पर बाकायदा मान्यता मिली हुई है. ये दिग्विजय सिंह सरकार की देन है. शिवराज सिंह तो बस इसे आगे बढ़ाते रहे हैं.

पहले एक संगठन बना था - अजाक्स यानी अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों का संगठन. अजाक्स के बाद पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों का संगठन अपाक्स का गठन हुआ. दोनों ही संगठनों का नेतृत्व राज्य के सीनियर नौकरशाह कर रहे हैं.

अब एक नया संगठन चर्चा में छाया हुआ है - सपाक्स, जो मध्य प्रदेश के सवर्ण कर्मचारियों का संगठन है. सपाक्स सुर्खियों में तब आया जब सवर्णों के भारत बंद के दौरान शिवराज सरकार को कदम कदम पर सुरक्षा के इंतजामात के साथ साथ जगह जगह धारा 144 भी लागू करनी पड़ी. अजाक्स और अपाक्स की तरह ही सपाक्स की अगुवाई भी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी कर रहे हैं.

हाल फिलहाल एक दिलचस्प वाकया हुआ. एक दिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अजाक्स के मंच से घोषणा की कि उनके रहते कोई माई का लाल भी प्रमोशन में आरक्षण खत्म नहीं कर सकता. ज्यादा देर भी नहीं लगी और देखते ही देखते सपाक्स के सदस्य खुद को माई का लाल बताने लगे.

जिस तरह बिहार में सवर्णों के बंद को सवर्ण सेना का बंद बताया गया, उसी तरह मध्य प्रदेश में इसके पीछे सपाक्स का बड़ा रोल माना गया. हालांकि, सपाक्स की ओर से इसका खंडन किया गया है.

माना जा रहा है कि पिछले दो साल में सपाक्स के प्रभाव का दायरा काफी बढ़ा है. अब तो सपाक्स ने चुनाव आयोग से राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने की भी मांग की है - और ऐलान किया है कि आने वाले दिनों में सपाक्स के उम्मीदवार लोक सभा की सभी 29 और विधानसभा की 230 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे भी. कर्मचारी संगठन के चुनावी मैदान में उतरने के ऐलान से इतर गली मोहल्लों से लेकर चौक चौराहों तक कोटा पर नोटा लगाने की मांग हो रही है - और ये भी तकरीबन बीजेपी के संपर्क फॉर समर्थन अभियान जैसा ही चल रहा है.

बीजेपी ने पहले मंडल के जवाब में कमंडल को हथियार बनाया था - अब कोटा को लेकर विरोध की आवाज बने नोटा को लेकर बीजेपी अपनी अपनी परिभाषा गढ़ रही है. ऐसा न हो कि शाइनिंग इंडिया की तरह मुकालते में रहे और बैठे बैठे सारे खेल उल्टा पड़ जाये - क्योंकि ये पब्लिक है सब खेल जानती और बाखूबी समझती है.

Source - IChowk 


Follow by Email