आदरणीय पोप, अबॉर्शन हत्या है तो पुरुषों से कहिए कॉन्डम का इस्तेमाल करें


वैटिकन का नाम सुना होगा आपने? वैटिकन या वैटिकन सिटी, इटली में एक स्वतंत्र राज्य है. यह रोमन कैथोलिक राज्य है. जिसका शासन रोम के पादरी (जिन्हें ‘पोप’ कहा जाता है) उनके हाथों में है. यह एक ‘थियोक्रेसी’ है. यानी जिस देश या राज्य का शासन धर्मगुरु करते हैं. जहां धर्म के आधार पर सरकार चलती है. यहां के वर्तमाकहा जाता है कि पोप फ्रांसिस बाकी पोप्स के मुकाबले काफी प्रगतिशील हैं. ऐसे बहुत कम धर्मगुरु हैं जो उनकी तरह LGBT को खुलेआम सपोर्ट करेंगे. या पूंजीवाद के विरोध में मुखर होंगे. या अवैध घुसपैठियों के लिए अधिकारों की मांग करेंगे. मगर हाल ही में इन्होंने कुछ ऐसा कहा जो सालों से हर कट्टर, रूढ़िवादी ईसाई अंधभक्त कहता आया है.


सेंट पीटर्ज़ स्क्वेर में एक बड़ी भीड़ के सामने पोप फ्रांसिस ने अबॉर्शन की कड़ी निंदा की.

उन्होंने कहा, ‘विमेंस राइट्स के नाम पर अपनी कोख के बच्चे को मार डालने को अबॉर्शन कहते हैं. आप ही बताइए, एक इंसान की जान लेना कोई समस्या का समाधान करने का तरीका है क्या? कोई इंसान कितना भी छोटा हो, उसे मारना बिल्कुल सही नहीं. गुंडों द्वारा किसी को मरवाने और अबॉर्शन करवाने में कोई फर्क नहीं.’



पोप औरतों के रिप्रोडक्टिव राइट्स के बारे में ऐसे वाहियात बयान देने वाले अकेले नहीं हैं. अमेरिका में अबॉर्शन के मुद्दे पर एक वैचारिक जंग चल रही है. एक तरफ़ हैं ‘प्रो-चॉएस’ लोग. जो कहते हैं कि किसी औरत को मां बनने के लिए फ़ोर्स करना ग़लत है. वह चाहे तो अबॉर्शन के लिए जाना उसका अधिकार है क्योंकि उसका शरीर सिर्फ़ उसका है. दूसरी ओर हैं ‘प्रो-लाइफ़’ वाले. जो कहते हैं कि फ़ीटस (भ्रूण) भी एक इंसान है. उसे भी जीने का हक़ है. इनके दावे धार्मिक या नैतिक आधार पर ही होते हैं.

अबॉर्शन के ख़िलाफ़ लोग कई ऐसे तर्क पेश करते हैं जो बेबुनियाद और ग़लत हैं. साथ में एक महिला के शारीरिक अधिकारों के ख़िलाफ़ भी. यह तर्क हैं:

अबॉर्शन जीव हत्या हैन पोप हैं पोप फ्रांसिस. 2013 में यह पोप बने थे.

अबॉर्शन के खिलाफ बोलनेवाले कहते हैं कि फ़ीटस एक जीव है. एक इंसान है. उसे गिरवाना हत्या से कम नहीं. और अबॉर्शन करनेवाले सभी डॉक्टरों को गुनहगार माना जाना चाहिए. 

मगर असलियत यह है कि एक फीटस 24 हफ्तों के होने तक पूरी तरह से डेवेलप नहीं होता. 24 हफ्ते से पहले वह एक मांस का टुकड़ा ही होता है. जिसे इंसान नहीं माना जा सकता. इस समय वह दर्द भी महसूस नहीं कर सकता क्योंकि उसका नर्वस सिस्टम ही तैयार नहीं हुआ है. इसलिए नियम है कि 22-24 हफ्तों के बाद अबॉर्शन नहीं कराया जा सकता. या मां की जान खतरे में होने पर ही कराया जा सकता है.

लंदन के Royal College of Gynecologists and Obstetricians ने फीटस अवेयरनेस पर अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘सबूत से पता चला है कि कोर्टेक्स (ब्रेन का एक हिस्सा) की प्रॉसेसिंग अबिलिटी 24 हफ़्तों से पहले डेवेलप नहीं होती. इसी वजह से इस समय से पहले फीटस को दर्द भी महसूस नहीं होता.’

बच्चे भगवान का आशीर्वाद हैं. उन्हें मारना नहीं चाहिए.

भगवान हैं भी या नहीं यह तो अलग डिबेट है. मगर हर औरत के पास इस ‘आशीर्वाद’ को जन्म देने, उसकी परवरिश करने का सामर्थ्य नहीं है. हो सकता है प्रेगनेंसी में कोई कॉम्प्लिकेशन आ गया हो. या बर्थ कंट्रोल उपलब्ध न होने की वजह से प्रेगनेंसी हुई हो. शायद आर्थिक कमजोरी की वजह से किसी के लिए मां बनना संभव नहीं. ऐसी सिचूएशन में तो यह आशीर्वाद नहीं, श्राप हो गया.

हर बच्चा ऐसी फैमिली डिज़र्व करता है जो उसे सचमुच चाहती हो. जिसे मां बनने की इच्छा या हैसियत नहीं, उस पर यह ज़िम्मेदारी थोपना बच्चे और मां दोनों के लिए बुरा है.

बाद में मां बनने में प्रॉब्लम हो सकती है.

ऐसा कहा जाता है कि अबॉर्शन करवाने से फर्टिलिटी की समस्या हो सकती है. बाद में मां बनने में दिक्कत हो सकती है. मगर यह आर्ग्युमेंट आज के दौर में लागू नहीं है. एक ज़माना था जब अबॉर्शन D&C (Dilation and Cutterage) तरीके से किए जाते थे. इसमें औरत की सर्विक्स (यूटरस का प्रवेश द्वार) फैलाकर, फीटस को नुकीले इंस्ट्रुमेंट से खोदकर फेंका जाता था. जिसकी वजह से यूटरस में खरोचें आ जातीं थीं और रिप्रोडक्टिव प्रॉब्लम्स हो सकते थे. मगर आज अबॉर्शन सक्शन द्वारा किया जाता है. World Health Organization (WHO) की इस तकनीक से फीटस को वैक्यूम से खींच लिया जाता है. यूटरस को चोट पहुंचाए बिना. आज अबॉर्शन और फर्टिलिटी की समस्या के बीच किसी कनेक्शन का कोई सबूत भी नहीं है

मां ने अपनी मर्ज़ी से सेक्स किया था. इसमें बच्चे की क्या ग़लती? भुगतो अब!

इन लोगों का मानना है कि अगर कोई औरत सेक्स कर सकती है तो प्रेगनेंट होने पर इतना रोना क्यों? क्यों कोई डॉक्टर ऐसी गैरज़िम्मेदार औरत को अपना समय दे? सरकार क्यों उसके अबॉर्शन का खर्चा उठाए? उसने गलती की तो सजा उसी को भुगतने दो.

ऐसे तो आप यह भी कह सकते हैं कि लंग कैंसर के ट्रीटमेंट पर बैन लग जाना चाहिए. लोग तो अपनी मर्ज़ी से सिगरेट पीते हैं न! अपनी मर्ज़ी से खुद को जोखिम में डालते हैं. तो उन्हें भी कैंसर से मर जाना चाहिए. ट्रीटमेंट के लिए नहीं जाना चाहिए.

जनता को अच्छा और सस्ता हेल्थकेयर दिलाना सरकार और डॉक्टरों का फर्ज है. मरीज को जज करना या उनके कैरेक्टर पर सवाल खड़े करना उनका काम नहीं. कोई अबॉर्शन भी चाहे तो बिना सवाल पूछे उन्हें यह हक दिलाना चाहिए.

अबॉर्शन कानूनी हो गया तो कोई बर्थ कंट्रोल का इस्तेमाल नहीं करेगा

अमेरिका की एक स्टडी के अनुसार अबॉर्शन करवाने वालों में से 8% महिलाओं ने कभी बर्थ कंट्रोल यूज़ नहीं किया. और इनमें ज़्यादातर गरीब अल्पसंख्यक औरतें ही आतीं हैं. जिनके पास बर्थ कंट्रोल उपलब्ध नहीं होता. किसी के पास बर्थ कंट्रोल का विकल्प हो तो वह फालतू में अबॉर्शन का झंझट क्यों उठाएगा?

सेक्स एजुकेशन, बर्थ कंट्रोल की जानकारी और सस्ते बर्थ कंट्रोल के होने से अबॉर्शन के रेट्स बढ़ेंगे नहीं. बल्कि घटेंगे.

मुद्दे की बात यही है कि अबॉर्शन हर औरत का शारीरिक अधिकार है. कोई मर्द उसे इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता, चाहे वह पोप या कोई नेता ही क्यों न हो. यह एक मामूली मेडिकल प्रोसीजर है जिसे धर्म या नैतिकता से नहीं जोड़ना चाहिए. बल्कि इसे हर महिला के लिए सुलभ, सस्ता और सेफ बनाने पर फोकस करना चाहिए.

Source - ON India 


Follow by Email