क्या आपकी WhatsApp चैट हिस्ट्री अपने आप हो जाएगी ड...



इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप में बड़ा बदलाव हो रहा है. अगस्त में हमने आपको बताया था कि कंपनी ने गूगल के साथ पार्टनर्शिप की है. इसके तहत गूगल ड्राइव में वॉट्सऐप के चैट्स बैकअप डिफॉल्ट तौर पर दिया जाएगा.

कंपनी ने यह भी कहा है कि अगर 12 नवंबर तक यूजर्स ने अपने वॉट्सऐप चैट्स बैकअप को गूगल ड्राइव पर रिफ्रेश नहीं किया है तो उनकी चैट हिस्ट्री डिलीट की जा सकती है. हालांकि यह गंभीर समस्या नहीं है, क्योंकि अगर आप हमेशा बैकअप लेते हैं या फिर चैट्स आपके स्मार्टफोन में हैं तो वो डिलीट नहीं होंगे.

गूगल के साथ की गई पार्टनर्शिप के तहत गूगल ड्राइव पर वॉट्सऐप चैट्स का बैकअप रखने से आपको दिए गए स्पेस में कोई कमी नहीं आएगी.

गूगल ड्राइव पर वॉट्सऐप चैट्स बैकअप रखने का फायदा ये है कि इसे किसी भी स्मार्टफोन पर आसानी से ओपन कर सकते हैं. अगर आपने नया फोन लिया है या फिर वॉट्सऐप के लिए नए स्मार्टफोन को यूज कर रहे हैं ऐसे में ये फीचर आपके लिए फायदेमंद साबित होगा. 

गूगल ड्राइव पर वॉट्सऐप का बैकअप लेने के लिए अपने स्मार्टफोन गूगल ड्राइव को ऐक्टिवेट कर लें. बैकअप बनाने के लिए वॉट्सऐप के मेन मेन्यू में जा कर सेटिंग्स पर टैप करें. यहां चैट का ऑप्शन होगा यहां आप बैकअप टू गूगल ड्राइव सेलेक्ट कर सकते हैं. यहां बैकअप फ्रिक्वेंसी का ऑप्शन मिलेगा जिसे अपने हिसाब से चुन लें. जिस अकाउंट में चैट्स बैकअप सेव करना है यहां एंटर करें.

कंपनी के यूजर्स को बैकअप लेते समय फोन को वाईफाई से कनेक्ट करने की सलाह दी है, क्योंकि बैकअप फाइल्स साइज में अलग होती हैं और डेटा खपत करते हैं जिससे आपको एक्स्ट्रा डेटा के पैसे लग सकते हैं.

गौरतलब है कि वॉट्सऐप चैट बैकअप सिस्टम दूसरे चैटिंग ऐप से अलग है. क्योंकि वॉट्सऐप के चैट्स और मीडिया किसी डेटिकेटेड सर्विस में स्टोर होने के बजाए फोन में ही स्टोर होते हैं. इसलिए फोन बदलते समय वॉट्सऐप का डेटा बैकअप लेना जरूरी होता है, इसलिए यूजर्स को गूगल क्लाउड का सहारा लेना होता है. हालांकि आईफोन में वॉट्सऐप का डेटा iCloud पर बैकअप होता है, लेकिन आम तौर पर लोगों का फ्री कोटा जल्द ही खत्म होता है.

छत्तीस घंटे से ज्यादा बिना अन्न-जल के रहने के अलाव...



एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. आज छठ पर्व मनाया जा रहा है. त्यौहार मनाने वालों ने आज शाम के डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया. कल उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाएगा. छठ के अवसर पर रश्मि का लिखा पढ़िए –

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अब तक गेहूं समेटे जा चुके हैं जो छतों पर या आंगनों में साफ धुले कपड़ों पर सुखाए जा रहे थे. इन गेहूओं की निगरानी में कोई न कोई ज़रूर रहता है. कहीं कोई चिड़िया,कौवे या चूहे-बिल्ली छू न दें..जूठी न कर दें..! आखिर सिपुली में इन्हीं गेहूओं का बना ठेकुआ चढ़ेगा, प्रसाद बनेगा. सूर्य को अर्घ्य देते समय ये ठेकुए भी टीके जाएंगे. कल ‘रसियाव-रोटी’ में भी इसी की रोटी होगी.

बहुओं-बेटियों को बड़ी अम्मा पल-पल धिरा रही हैं. सुद्ध (शुद्ध) देह से जो नहीं है, वो रसोई से खुद ही दूर खड़ी हैं. पीतल और तांबे के बड़े-बड़े परात, भगोने और कड़ाह बड़का बाकस से निकाल के, धो के चमकाए जा चुके हैं. छठी मईया को बहुत जल्द क्रोध आता है. साफ-सफाई का ध्यान पग-पग पर रखना पड़ता है. अम्मा की एक दहाड़ पर बड़की भाभी के हाथ की कटोरी झनझनाती हुई दूर जा गिरी. हालांकि चप्पल तो उन्होंने बाहर ही निकाल दिया था पर रसोई के दरवाजे से लगा एक चप्पल पूरी रसोई को फिर से धोने का सबब बन गया. मन ही मन छठी मईया से माफी मांगती अम्मा भयभीत हो उठी –





हे छठी मईया, लइकन के गलती माफ करीहs..

लालटेन की रौशनी में अम्मा के माथे की लकीरें साफ दिख रही हैं. इस देवउठान के बाद फिर से मझली बिटिया की कुंडली हर बड़े घर में घूमेगी. मांगलिक बिटिया के जोड़ का लड़का मिलता ही नहीं. छठी मईया बेटी का सगुन जगा दें तो अगले साल घाट पर अम्मा बाजा बजवा दें.

मोटरसाइकिल की आवाज़ सुनते ही महिलाएं सतर्क हो उठीं. छोटका भैया छठ में पहनने वाले सबके नए कपड़े लाने शहर गए थे. अभी वो आकर बैठे ही थे कि नन्हकी ने पॉलिथीन में झांकना शुरू कर दिया. आंखें दिखाते हुए उसे पेड़ा-पानी लाने को कहकर अम्मा सामान समेटने लगी. छोटकी भाभी ने कत्थी रंग की साड़ी की उम्मीद में भैया से आंखों ही आंखों में सवाल-जवाब कर लिया. ननदों ने उनका सवाल-जवाब समझ कर एक दूसरे को केहुनिया भी लिया. तब तक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई.

छठ में बड़की दिदिया आने वाली थी. बहनें दौड़ पड़ीं बाहर. दो ही साल में दुगुनी हुई बड़की दिदिया सर-सामान सहित भरी-भरी सी अम्मा के पैर छूने के लिए झुकीं. डबडबाई आंखों से अम्मा ने उन्हें गले लगा लिया. भाभियों ने पल भर में उनके ज़ेवर तौल लिए और अम्मा ने किसी खुशखबरी की टोह ले ली.

जीतना ने आंगन में धम्म से पुवरा(पुआल) का ढेर रखा-

लीं मलिकाइन,आ गईल आपके बिछौना.

कल से अम्मा इसी पुवरा के बिछावन पर कम्बल डाल कर सोएंगी. गंगा जल छिड़के बरामदे में पुवरा को रख कर जीतना जल्दी से बाहर भागा. उसकी माई ने भी छठ रखा है इस साल.

बिना प्याज़-लहसून का खाना बनाती बड़की भाभी धीरे-धीरे गुनगुना रही है-

कांचहीं बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए
भरइत होईं ना कवन राम,भार घाटे पहुंचाए
कांचही..

बाट जे पुछेला बटोहिया,भार केकरा के जाए
तोहे नाहीं मालूम रे बटोहिया,भार छठी मइया के जाए
कांचही..

तू तs आन्हर होइहे रे बटोहिया,भार छठी मइया के जाए
कांचही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाए

रविंदर भैया ने कांधे पर केले का बड़ा सा घौद लिए प्रवेश किया और छह केले तोड़ते हुए छोटकी को थमाया. अम्मा के पैर छूते हुए उन्होंने ओरहन दिया –

का हो काकी, सब कोहड़ा(पीला कद्दू) अकेले आप ही चढाएंगी छठी माई को?

अम्मा ने छोटकी को केलों को लिपे-पुते पूजा घर मे रखने का इशारा करते हुए हंसते हुए रविंदर भैया से कहा –

पिछला पांच साल से गांव के कवनो छठइतिन खरीद के कोहड़ा सिपुली में चढ़ाई है बबुआ? जीतना भोरे से गायब है..ओकरा आते ही कोहड़ा बंटवाना है…

किसी के खेत का केला तो किसी के यहां बहुतायत में उगा मूली,सुथनी,आदी(अदरक), किसी के छप्पर का कोहड़ा तो किसी के आंगन में सालों से फल रहा गागल… सब पूरे गांव में बांटे जाते हैं प्रेम और श्रद्धा से छठी मैया के नाम पर.

छठ प्रकृति का पर्व है. प्रेम और सद्भाव का पर्व है. जाति-पाती के बंधन को अस्वीकारता एक ही घाट पर, एक ही सूर्य को अर्घ्य देने को उठे हज़ारों हाथों का पर्व है. वहां उपस्थित हर छोटे बड़े को एक कर देने का पर्व है.

आज खरना है. यानी ‘रसिवाय-रोटी’ का दिन. गोधन के दिन ही पोखरा के साफ-पवित्तर माटी का चूल्हा बना दिया था अम्मा ने. आंगन में सूख कर दप-दप करते इसी चूल्हे पर आज रात रसियाव-रोटी बनेगी. दिन भर निर्जल -निराहार रही अम्मा सांझ को रसियाव-रोटी के प्रसाद का सेवन करेंगी. सावधानी से छोटका भैया से चूल्हा उठवा कर उसे पूजा-घर मे रखवाती अम्मा को ध्यान आया कि अब तक ‘साठी का चावल’ तो आया ही नहीं. इसी चावल का तो रसियाव बनेगा आज –

ओह! कैसे भूल गए हम? हे छठी मईया… अब उमिर हो गया है… जल्दी से बड़का बेटा पोता का मुंह दिखा देता तो बड़की पतोह को छठ-व्रत थमा देते…

बार-बार छठी मइया को गोहराती अम्मा अपने पुवरा के बिछौना पर कमर सीधी करने बैठी. न जाने क्यों मूड़ी घूम रहा है.

देखते ही देखते शाम हो आई..रसियाव-रोटी का बेरा हो आया. बगल के आंगन से उठती धुएं की लकीर को देख अम्मा ने आवाज़ लगाई ही थी कि नहा-धो के बड़की भाभी आती दिखी. थोड़े लकड़ियों का गट्ठर चूल्हे के पास जीतना से रखवाती भाभी ने चूल्हे को प्रणाम कर अगिन देव को मन ही न याद किया और आग सुलगाई. सूखी लड़कियां चटक कर ललछौहां प्रकाश बिखेरती जल उठीं. भाभी का चेहरा उस प्रकाश में दमक उठा.

भगोने में गाय के दूध में साठी के चावल को मिलाती भाभी ने रोटी बनाने वाली चौकी पर ही कुछ सूखे मेवे कतरे और गुड़ के ढेले को बेलन से पीट कर महीन कर लिया. चीनी नहीं गुड़ पड़ता है रसियाव में. अम्मा धीरे धीरे छठ के गाने गुनगुनाने लगीं.

‘गोदी के बलकवा के दीहs छठी मईया ममता दुलार
पिया के सनेहिया बनइह मइया दीहs सुख सार
सरधा से कर तानीं हमहूँ छठी मइया बरत तोहार..!’

रसियाव-रोटी तैयार था. हर रोटी को टीक कर केले के पत्ते पर रख कर सर्वप्रथम अगिन देव और छठी मैया को भोग लगाया गया. पीढ़े पर अम्मा बैठी. सफेद बालों के बीच दमकता पीला सेनुर उन्हें अलौकिक बना रहा था. दो ही रोटियां खा कर पानी पी चुकी अम्मा ने रसियाव-रोटी का प्रसाद हर एक सदस्य को परोसा. सबके माथे पर टीका लगाती अम्मा ने मन ही मन अपने बगीचे के हर फूल की रक्षा करने की गुहार छठी मैया से लगाई –

हे माता! हर साल की तरह इस साल भी बिना किसी बाधा के ये व्रत सम्पूर्ण करवा देना.

छोटका भइया ने अम्मा को पुआल के बिछौना पर सुलाते हुए लालटेन की बत्ती कम की. अब इसके बाद पूरे छत्तीस घण्टों का निर्जल व्रत है. ऐसे ही इसे महापर्व थोड़ी कहते हैं.

आज छठ है. संझिया घाट. सुबह से गहमा-गहमी लगी हुई है. आज फिर बगल के आंगन से धुएं की लकीर पहले उठी. इतना गुपचुप काम करती हैं उधर की बहुएं, कुछ पता ही नहीं चलता. ऐसे ही अम्मा हाई बीपी की मरीज़ हैं ऊपर से व्रत में उन्हें और ज़्यादा गुस्सा आता है.

नहा धो के प्रसाद बनने वाले चूल्हे के पास बैठी बहु- बेटियां उत्साह से लबरेज़ हैं. बड़े बड़े परातों में ठेकुआ का आटा गुड़ के साथ गूंथा जा रहा है. सूखे गरी-छुहारों को बाबूजी के सरौता से काटती छोटकी का सारा ध्यान इस बात पर है कि कहीं नन्हकी उससे पहले पायल न मांग लें भाभी से. घाट पर पहन कर जाने के लिए. भक्तियाह कड़ाही आंच पर रखती भाभी की आंखें धुंए से जल उठी. पर आंच जलाने के लिए फुंकनी का इस्तेमाल नहीं करना है. ऐसे तो प्रसाद जूठा कहलाएगा न!

बड़की दीदी ने जल्दी से उन्हें बेना थमाया. बेना झलती भाभी ने थोड़ी मशक्कतों के बाद आग जला ही लिया. घी भरी कड़ाही में एक के बाद एक कई ठेकुए डाले. फूल कर स्पंजी हुए ठेकुओ की खुशबू से घर गमक उठा. छोटकी भाभी ठेकुआ-खजूर बनाने वाले सांचों पर जल्दी जल्दी घी लगा कर विभिन्न आकृतियों में लोइयों को ढाल रही थीं और ननदें लोइयां बना रही थीं.

पूड़ियां भी तली जाती हैं..भूल गई बड़की?

– अम्मा ने याद दिलाया. लड़कियों को आवाज़ देती अम्मा ने फिर क्रोध-मुद्रा दिखाई –

छठी मैया का गीत गाने के लिए तुम सब को अलग से नेवता दिया जाएगा? एक हमलोग थे, गाते -गाते कंठ झुरा जाता था पर गाना बंद नही करते थे.

लड़कियों की आवाज़ से आंगन चहक उठा-

केरवा जे फरेला घवद से
ओपर सुग्गा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुग्गा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवेळी वियोग से
सुग्गा गिरे मुरुछाय
मत रोवs सुगनी वियोग से
आदित होई ना सहाय
केरवा जे फरेला..

बड़े बड़े दो दउरों को भैया ने ओसारे में रखा. धोकर रखे गए सारे फ़ल एक तरफ थे. एक तरफ घी में पके और गुड़ में पगे ठेकुओं का कठरा था. हर सिपुली में ठेकुओं-पूड़ियों सहित केला, सेब, नारंगी, सिंघाड़ा, मूली, सुथनी, नारियल, आरता का पत्ता, पान-सुपारी, लौंग-इलायची, गागल, नींबू, अरबी, ईख का टुकड़ा, बताशा-लड्डू, भींगे मटर के दाने इत्यादि बहुत ध्यान से सजाए जाने लगे.

सूर्यदेव तेज़ी से पूरब से पश्चिम की बढ़े जा रहे थे. अम्मा का चेहरा व्रत के तेज से दमक रहा था. अम्माँके पैर रंगती बड़की भाभी ने मन ही मन सोचा –

अम्मा कितनी सुंदर हैं.

सुर्ख लाल रंग की साड़ी में लिपटी अम्मा ने भर मांग सिंदूर की लकीर खींची. बड़ी सी लाल बिंदी दोनों भवों के बीच लगाती अम्मा सर के ऊपर आंचल टिकाती उठ खड़ी हुई. चार अंगुल मोटी पायल अम्मा के पैरों में छनक उठी. बड़की दीदी ने काठ वाली अलमारी से अम्मा का भारी हार निकाला. झुमकों के साथ. टीका और नथ भी.

वापस रख ये टीका-नथिया. बुढापा में ये सोभा नही देता.

अम्मा ने मना कर दिया. बाहर से अंदर आते बाबूजी ने मुस्कुराती आंखों से अम्मा को देखा और अम्मा का चेहरा और भी दिव्य हो उठा.

उधर बिचला कोठरी में लड़कियों में महा-संग्राम लगा हुआ था. पायल एक ही जोड़ी थी और पहनने के दावेदार दो जोड़ी पैर थे. जीत छोटकी की हुई और नन्हकी ने अपने फुले गालों वाले मुंह को और फुला लिया. मझली ने दुपट्टे से खुद को लपेट कर छोटी सी काली बिंदी लगाई. सैंडल में पैर फंसाया ही था कि पैर मुचुक गया. नया सैंडल टूट चुका था.स्थिति ये है कि हवाई चप्पल को अपने दुपट्टे से ढक कर मझली दीदी ने सेकंडों में फैसला कर लिया कि घाट पर वो सिर्फ बैठी रहेगी. उठेगी नहीं. बड़की दीदी ने सास की दी हुई सुग्गा-पंखी रंग की बनारसी साड़ी के ऊपर अपना मोती वाला हार पहना और जल्दी से आंगन की ओर भागी.

चार ही खंड के पोखरवा
बीचे दुधवा के धार
पहिरू पहिरू ना कवन देवी पियरिया
भइले अरगा के बेर
पहिरू पहिरू ना कवन राम पियरिया
भार घाटे पहुंचाए
चार ही खंड के पोखरवा
बीचे दुधवा के धार

दोनों तरफ दउरा लिए बड़का और छोटका भइया के बीच खड़ी अम्मा. चारों बेटियों और एक दामाद के साथ घाट की ओर जा रही है. घाट घर से ज़्यादा दूर नहीं. नंगे पैर चलती अम्मा के रास्ते के पत्थर बाबूजी अपनी लाठी से हटाते चल रहे हैं. बेटियों के कंठ से निकले छठ गीत का साथ देती अम्मा गदगद है. कुछ परिवार जीप से, कुछ ट्रेक्टर-टेलर से, कुछ बैल गाड़ी से तो कुछ पैदल ही घाट की ओर बढ़ रहे हैं.

कुछ लोगों ने मन्नत मांगी थी, पूरी होने पर वो घर से घाट तक की दूरी साष्टांग दंडवत करते तय कर रहे हैं. एक बच्चा सड़क किनारे खड़ा है. उसकी माई अस्पताल में आखिरी सांसें ले रही है. किसी ने इसे कह दिया था कि छठ करने वालों के आशीर्वाद लेने पर माई ठीक हो जाएगी. वो हर छठइतिन को झुक झुक कर प्रणाम कर रहा है. सब उसकी माई के ठीक होने का आशीर्वाद दे रहे हैं. पूरा रास्ता छठमय है. हर कंठ जय छठी मैया के जयकारे लगा रहा है.

घाट पहुंच कर अम्मा ने एक ईख को दोनों बेटों की मदद से लगवाया और उसकी पूजा की. दउरों में रखे सिपुलिओं को चारों ओर से सजाया और पूरी श्रद्धा से छठी-मैया को प्रणाम किया.

घाट का क्या ही वर्णन करें! बिजली-बत्ती, कागज़ के झालरों और चमकती लड़ियों से सुसज्जित घाट. जगमगाते चेहरों, उल्लसित हृदय और उम्मीदों का लहराता जनसमूह… सब तैयार हैं. सब उत्साहित हैं. सबके पास कोई न कोई वजह है यहां आने की. किसी की कोई मन्नत है तो किसी की मन्नत पूरी हो गई है.

शारदा सिन्हा की आवाज़ से छठ घाट के चार कोनों पर लगे लाउडस्पीकर फुल वॉल्यूम में बज रहे हैं. घाट के किनारे किनारे बने सिरसोप्ता के पास अपने अपने दउरों को लिए बैठी छठइतिनों ने भी छठी-मइया के गीत छेड़ रखे हैं. लड़कियों की नजरें घाट के किनारे बने थोड़े ऊंचे मिट्टी के टीलों पर खड़े लड़कों पर हैं. और लड़कों की नजरें इन महकती-चहकती लड़कियों पर. फैशन का लेटेस्ट शो का साक्षी भी फिलहाल ये घाट ही है. दिल्ली और पंजाब से नए ब्रांड के मोबाइल के साथ घर पहुंचे लड़के ‘हम’ से ‘मैं’ पर उतर चुके हैं. उनके बालों में न जाने क्यों कुछ लटें गोल्डन कलर की हो गई हैं. मधुरिया देख के मन ही मन हैफ़ में है –

पिछला साल तक तो लछना के बाल ठीक थे,दिल्ली जा के का जाने कौन बिमारी पकड़ लिया इसको?

अर्घ्य देने की बेला समीप आ गई. मिट्टी काटकर सीढ़ी बनाने की कोशिश की गई थी. उन पर पैर रखती अम्मा धीरे धीरे पानी मे उतरती गई. छोटका भैया ने उन्हें एक तरफ से सहारा दे रखा था. ऊपर खड़े बाबूजी ने एक सिपुली बड़े भैया को थमाया और बड़े भैया ने अम्मा को. सूर्यदेव को जल देने के बाद अम्मा ने सिपुली से उन्हें अर्घ्य दिया. बारी बारी से बाबूजी और दोनों भाइयों ने सिपुली पर धीरे-धीरे जल प्रवाहित करते हुए अम्मा को अर्घ्य देने में मदद की.

डूबते सूर्य की लालिमा अम्मा की बड़ी सी बिंदी से एकाकार हो गई थी. पूरा परिवार अम्मां के इर्द गिर्द एकत्रित हो चुका था. सूर्य को अर्घ्य देती अम्मा की दोनों आंखें बह रही थीं. न जाने क्यों?

घाट पर बच्चे पटाखों में उलझ चुके थे. आतिशबाजियां हो रही थीं. और डूबते सूरज की एक समान किरणों को सबने बिना किसी भेदभाव के आपस मे बांट लिया था. छठ ही एकमात्र वो पर्व है जहां उगते सूरज से पहले डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है.

घर पहुंच कर लिपे-पुते आंगन में हाथी का जोड़ा-कोसी रखा गया. ईख की दो जोड़ी गट्ठरों के सहारे चाननी तानी गई. चारों तरफ मिट्टी के छोटे छोटे कोसे सजाए गए. हर कोसे में फल-मूल और ठेकुओं सहित एक दिए को रखा गया और कोसों सहित जोड़ा-कोसी के दिये प्रज्ज्वलित कर दिए गए. आंगन में जैसे साक्षात स्वर्ग उतर आया हो..

अम्मा आंगन की शोभा देखते ही गा उठीं-

राती छठी-मइया रहनीं रउआ कहवां
रहलो में रहलो कवन राम के अंगना
जोड़ल कोसिया भरल भइले तहवां
गज-मोती-चन्दना लीपल भइले तहवां
गाई के गोबरा लीपल भइले तहवां
राती छठी मइया..

बेटियां तैयार हो कर अब गांव में हर उस घर घूमने निकलीं जहां कोसी भरा गया था. लड़कियों का झुंड हर घर जाता, छठी मैया का गीत गाता और छठइतिन का आशीर्वाद लेता. जो शादीशुदा होतीं उन्हें दो से चार होने का आशीर्वाद मिलता और कुंवारियों को एक से दो होने का. जल्दी से घर भी जाना था. कल भोर वाला छठ है न! मुंह अंधेरे घाट जाना होता है और उगते सूरज की बाट जोहनी होती है पर आज रात नींद कहां? अम्मा अपने पुवाल वाले बिछौने पर आंखें बंद किए लेटी थीं. चौबीस घन्टे निर्जला व्रत का असर चेहरे पर साफ दिख रहा था.

अभी भोर तक और ताकत दे दें छठी-मैया…

– मन ही मन उन्होंने छठी मैया को स्मरण किया. छोटकी भाभी ने अम्मा के सर पर ठंडे तेल की मालिश की और पैर धीरे धीरे दबाने लगीं.

तीन बजे ही सबकी आंखें खुल गई थीं.आज इस महापर्व छठ का आखिरी दिन है. यानी ‘भोर वाला घाट’. आज फिर बगल वाले घर की बहु-बेटियां जल्दी उठ गई थी. अम्मा ने जल्दी जल्दी स्नान-ध्यान किया और पीले शॉल में खुद को लपेटा. घाट जाने वाले सारे सामानों को बड़की भाभी ने सजा रखा था. चाननी सहित ईख और मिट्टी के कोसों को जोड़ा-कोसी सहित दउरा में रखा गया. फिर से घाट पर जाना है, उगते सूर्य को अर्घ्य देना है. घाट पर फिर वैसी ही सजावट होगी जैसी कल रात आंगन में हुई थी. देखते ही देखते बेटियों ने कोसो सहित जोड़ा-कोसी सजा दिया. दीप जल उठे. ओस गिरते ब्रह्म मुहूर्त में घाट किसी अन्य ही दिव्य लोक सा प्रतीत हो रहा था. छठ के गीत फिर से गुंजायमान हो उठे.अब सूर्य के उदित होने का इंतज़ार था –

उगी हे सूरजदेव,भईल भोरहरिया
नयन खोली ना!
भइले अरगा के बेरिया
नयन खोली ना!

धीरे धीरे लालिमा के साथ सूर्यदेव सामने थे. अम्मा अथाह जल में उतर के, जल की लुटिया से जल गिराती फिर से सिपुली को माथे से लगाए उन्हें अर्घ्य दे रही थीं.

महापर्व सम्पूर्ण हुआ. बाबूजी के हाथ से कालीमिर्च डाली हुई शर्बत पीती अम्मा ने आंखें मूंदी. मन ही मन छठी मैया को लाखों-लाख धन्यवाद देते हुए बार-बार प्रणाम किया. ठेकुए का टुकड़ा मुंह मे रखा घाट पर मौजूद सभी छठइतिनों से मिलने चलीं. सभी सुहागिनें एक दूसरे को नाक से मांग तक भर-भर के पीला सिंदूर लगा रही थीं. भाभियां ननदों के गालों पर भी लगा देतीं और हंसी मज़ाक शुरू! मर्दों के कारण घर-पटीदारी के झगड़ों के कारण जहां आवाजाही बन्द है उस घर की औरतें भी इस घाट पर गलबहियां कर रही हैं. उन्हें क्या लेना देना मर्दों के झगड़े से आज. मिलने -मिलाने का दौर चल रहा है. शारदा सिन्हा जी की आवाज़ दूर दूर तक जा रही थी –

Source - Snoopwoop

Marvel Comics Legend & Real-Life Superhero Stan Le...



The writer, editor, and publisher co-created iconic characters such as Black Panther, Spider-Man, the X-Men, the Mighty Thor, Iron Man, the Fantastic Four, the Incredible Hulk, Daredevil and Ant-Man.

According to reports, he was rushed to the hospital from his home in LA but the cause of death has not been released yet.

During his long career, he has given us so much to cherish and fantasize about. Known for making cameos in almost all Marvel movies, he is the reason why we love superheroes so much.



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Reactions are pouring in, from the world over, to mourn the death of their beloved real-life superhero. 








There will never be another Stan Lee. For decades he provided both young and old with adventure, escape, comfort, confidence, inspiration, strength, friendship and joy. He exuded love and kindness and will leave an indelible mark on so, so, so many lives. Excelsior!!


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Rest easy, Stan Lee. I’ve said this before of others, but this is especially true for me today: it is the people that give you the permission to be weird who you miss the most. I cannot imagine my own imagination without his creative influence.
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comic books were my gateway as both a reader and writer. Stan Lee created worlds for me as a young Black kid growing up in the Bronx, to feel both seen and valued, with characters rich in nuance and layers.



Stan Lee did as much for the literary world as anyone living or dead.







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This man led a generation of nerds into a new light where being a nerd was cool. He helped show so many people that it is ok to be yourself, and to never be ashamed of what you enjoy. He was a hero to many, and the hero’s he created will serve as his legacy. RIP Stan Lee.

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