5जी के लिए कितनी तैयार देसी फर्में!

दूरसंचार क्षेत्र की नवीनतम तकनीक 5जी की 2020 तक आमद हो जाने की बातें की जा रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि भारतीय दूरसंचार कंपनियां इसके लिए किस हद तक तैयार हैं? सरकार ने मंगलवार को 5जी पर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर अपनी तरफ से पहल कर दी है। दूरसंचार विभाग ने इस समिति को भारत में 5जी तकनीक के सफल क्रियान्वयन के लिए योजना तैयार करने का दायित्व सौंपा है। 
संचार मंत्री मनोज सिन्हा ने इस समिति को 50 फीसदी भारतीय बाजार को लक्ष्य कर खाका बनाने का जिम्मा सौंपा है। इस घटनाक्रम के कुछ दिनों पहले ही दूरसंचार नियामक ट्राई ने उद्योग जगत से भी 5जी के मुद्दे पर सलाह मांगी है। हालांकि 5जी तकनीक अभी शुरू नहीं हुई है लेकिन इसमें डेटा की रफ्तार इतनी कमाल की होगी कि 4जी तकनीक भी फीकी लगने लगेगी। हालांकि विशेषज्ञों के बीच 5जी तकनीक की असली रफ्तार को लेकर मतभेद हैं, लेकिन उम्मीद है कि यह कम से कम 10 गीगाबिट प्रति सेकंड (जीबीपीएस) जरूर रहेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि स्पेक्ट्रम की गुणवत्ता अच्छी रही और तकनीक उम्दा हुई तो 5जी की रफ्तार 100 जीबीपीएस तक भी जा सकती है। 
इसका मतलब है कि 5जी की रफ्तार इस समय के सबसे तेज नेटवर्क 4जी की तुलना में 100 गुना से लेकर 1000 गुना तक अधिक होगी। 4जी के तहत अधिकतम 1000 मेगाबिट प्रति सेकंड (एमबीपीएस) की ही रफ्तार मिल पाती है। डेटा की इतनी तेज रफ्तार आपको जादुई लग सकती है, लेकिन भारत में इस संचार प्रौद्योगिकी को सफलतापूर्वक लागू कर पाने की राह में गंभीर चुनौतियां भी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि तरंग-आधारित संचार के बजाय ऑप्टिक फाइबर के जरिये कॉल प्रोसेसिंग को सेल्युलर नेटवर्क तक पहुंचाने की चुनौती सबसे बड़ी है। दूरसंचार कंपनियों के मुताबिक देश भर में 4.5 लाख से अधिक मोबाइल टॉवर हैं, लेकिन 18-20 फीसदी टॉवर ही फाइबर ऑप्टिक से जुड़े हैं। वैसे 5जी तकनीक की शुरुआत जिन महानगरों में होने की संभावना है वहां पर यह अनुपात बेहतर है। लेकिन इन महानगरों में भी केवल 35 फीसदी टॉवर ही फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क से जुड़े हैं।
तस्वीर बदलने के लिए संचार कंपनियों को तीन से चार साल का समय चाहिए होगा। फाइबर नेटवर्क बिछाने के लिए उन्हें बड़े पैमाने पर निवेश भी करना होगा। फिलहाल अधिकतर कंपनियां अपने नेटवर्क को 4जी तकनीक के मुताबिक ढालने के लिए निवेश कर रही हैं ताकि वे देश भर में अपना नेटवर्क फैला सकें। भारतीय सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक केवल 35 फीसदी टॉवर ही 4जी तकनीक के अनुकूल हैं और यह आंकड़ा 90 फीसदी तक पहुंचाने में ही कम से कम तीन साल लग जाएंगे।
हालांकि 5जी की राह में यह इकलौती चुनौती नहीं है। संचार कंपनियों को 5जी सेवा देने के लिए आसपास स्थित स्पेक्ट्रम की भी जरूरत होगी। अलग-अलग ब्लॉक में स्थित स्पेक्ट्रम उनके लिए खास मददगार नहीं होंगे। लेकिन फिलहाल तो भारत में इस तरह के स्पेक्ट्रम बैंड केवल ऊपरी स्तर पर ही मौजूद हैं। कंपनियों का कहना है कि 5जी के तहत तीव्र डेटा सेवा देने के लिए कम-से-कम 50-100 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की दरकार होगी जबकि 4जी सेवाओं के लिए 5 मेगाहर्ट्ज के ब्लॉक की ही जरूरत होती है। मसलन, ट्राई ने 5जी सेवा के लिए 3300-3400 और 3400-3600 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की शिनाख्त की है। लेकिन स्पेक्ट्रम के ऊपरी बैंड पर कवरेज निम्न स्तर का होता है। इसका मतलब है कि संचार कंपनियों को 5जी सेवा देने के लिए कहीं अधिक टॉवरों की जरूरत होगी।
हालांकि आप्टिकल फाइबर से लैस इन टॉवरों की ऊंचाई कम होगी और हार्डवेयर का बोझ न होने से उनका वजन भी कम होगा लेकिन इसके लिए भी निवेश तो करना ही होगा। सरकार ने भले ही भारत में 5जी तकनीक को वर्ष 2020 तक लाने का लक्ष्य रखा है लेकिन दूरसंचार क्षेत्र का मानना है कि वर्ष 2021-22 तक ही यह संभव हो पाएगा। एक शीर्ष संचार कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'हमारा आकलन है कि महानगरों में पहली 5जी सेवाओं की शुरुआत 2021-22 में ही हो पाएगी।' इस अधिकारी का कहना है कि रेडियो फ्रीक्वेंसी वाले उपकरणों की तकनीक में सुधार होने से अतिरिक्त टॉवर लगाने की जरूरत कम हो जाएगी जिससे आर्थिक बोझ भी कम पड़ेगा। उनका मानना है कि शुरुआती दौर में देश के बड़े शहरों में 5जी आधारित वाई-फाई सेवाएं शुरू हो सकती हैं।
Source-Business Standard

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