जिन्ना का वो दस्तावेज, जो बदल सकता था भारत का इतिहास, नहीं होता बंटवारा

जिन्ना के यदि एक राज का खुलासा हो जाता है तो भारत पाकिस्तान के बंटवारे जैसी दु:खद ऐतिहासिक घटना से बचा जा सकता था. जिन्ना की बेटी तक को इस बारे में उनकी मौत के बाद पता चला.

पाकिस्तान हर साल 11 सितंबर को अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की पुण्यतिथि मनाता है. वे जिन्ना जिनकी जिद के कारण भारत के दो टुकड़े हुए. पाकिस्तान का निर्माण उनका सपना था. लेकिन वे अपने सपनों के पाकिस्तान में सिर्फ 13 महीने ही रह सके. 11 सितंबर, 1948 को जिन्ना का 72 साल की उम्र में निधन हो गया था. उनकी मौत टीबी से हुई थी. उस समय गंभीर मानी जाने वाली जिन्ना की इस बीमारी का पता बहुत चुनिंदा लोगों को ही था. इनमें जिन्ना के डॉक्टर जाल आर. पटेल और उनकी बहन फातिमा भी शामिल थीं.
फ्रांसीसी पत्रकार डोमिनीक लापिएर और अमेरिकी लेखक लैरी कॉलिन्स ने अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखा है, ‘जिन्ना जानते थे कि यदि उनके हिन्दू दुश्मन को पता चल गया कि वे मरने वाले हैं तो उनका पूरा राजनीतिक दृष्टिकोण बदल जाएगा. वे उनके कब्र में पहुंचने का इंतजार करेंगे और फिर मुस्लिम लीग के नेतृत्व में नीचे के ज्यादा नरम नेताओं के साथ समझौता करके उनके सपनों की धज्जियां उड़ा देंगे.


यदि अप्रैल, 1947 में लुई माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी को बहुत ही असाधारण ढंग से जिन्ना द्वारा छुपाकर रखे इस रहस्य का पता होता, तो विभाजन का खतरा टाला जा सकता था. यह रहस्य फिल्म के एक टुकड़े पर एक अटल सत्य की तरह अंकित था, उस फिल्म पर जो एशिया के इतिहास की दिशा को बदल सकती थी.इस रहस्य को इतना छिपाकर रखा गया कि अंग्रेजों की पुलिस भी इसका पता नहीं लगा सकी.

माउंटबेटन को नहीं बताया गया कि जिन्ना मरने वाले हैं...

भारत के अंतिम वायसराय लुई माउंटबेटन को ब्रिटिश सरकार की ओर से जो हिदायतें दी गई थीं, उनमें इस बात की ओर कोई संकेत नहीं किया गया था कि जिन्ना बहुत जल्दी मरने वाले हैं. जिन्ना के मरने के 25 साल बाद माउंटबेटन ने कहा कि यदि उन्हें यह बात उस समय मालूम होती तो वे भारत में अलग ही तरह से काम करते. माउंटबेटन से पहले वाले वायसराय लार्ड वेवल ने 10 जनवरी और 28 फरवरी 1947 को अपनी डायरी में लिखा था कि जिन्ना बीमारी आदमी हैं. लेकिन इन रिपोर्ट में यह नहीं लिखा गया था कि जिन्ना की बीमारी कितनी गंभीर है.

बेटी को जिन्ना के मरने के बाद पता चला

जिन्ना की बेटी मिसेज वाडिया ने दिसंबर, 1973 में फ्रीडम एट मिड नाइट के लेखकों को एक साक्षात्कार के दौरान बताया था कि उन्हें जिन्ना की बीमारी का पता उनके मरने के बाद चला. उनका मानना था कि जिन्ना ने यह भेद अपनी बहन फातिमा को बता दिया था. लेकिन वे उसे न तो किसी को बताने देते थे और न ही किसी की मदद लेते थे.

एक्स-रे के लिफाफे पर नहीं था किसी का नाम

जिन्ना के एक्स-रे में क्षय इतना व्यापक था कि मरीज सिर्फ दो-तीन साल ही जी सकता था. एक्स-रे की ये फिल्म एक लिफाफे में बंद थी, जिस पर किसी का नाम नहीं लिखा था. यह लिफाफा मुंबई के प्रसिद्ध डॉक्टर जाल आर. पटेल की तिजोरी में सुरक्षित था. जिस आदमी के फेफड़ों की ये तस्वीर थी वह वही जिद्दी और अड़ियल था, जिसने लुई माउंटबेटन के भारत की एकता को बनाए रखने के सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया था.

जिन्ना हर भाषण के बाद घंटों हांफते थे

इस घातक रोग का पता, जो जिन्ना के जीवन को बहुत तेजी से समाप्त कर रहा था, डॉक्टर पटेल को माउंटबेटन के भारत आने से नौ महीने पहले जून 1946 में तब चला, जब उन्होंने उन फिल्मों को डेवलप करके पानी की ट्रे में निकाला. टीबी के क्रूर अभिशाप ने पाकिस्तान के मसीहा के फेफड़ों पर सत्तर वर्ष की आयु में हमला किया.

जिंदगी भर कमजोर फेफड़ों की वजह से जिन्ना का स्वास्थ्य खराब रहा था. युद्ध से बहुत पहले बर्लिन में वह प्लूरिसी से पैदा होने वाली पेचीदगियों का उपचार करा चुके थे. उसके बाद उन्हें बार-बार ब्रांकाइटिस की खांसी का दौरा पड़ता था. कोई लंबा भाषण देने के बाद घंटों हांफते थे.

जब बीच रास्ते में जिन्ना को ट्रेन से उतरना पड़ा

मई, 1946 के अंत में शिमला में जिन्ना पर फिर ब्रांकाइटिस का दौरा पड़ा. जिन्ना की हमदर्द बहन फातिमा ने उन्हें तुरंत बंबई की गाड़ी में बैठा दिया. लेकिन रास्ते में उनकी हालत खराब हो गई. डॉ. पटेल को फौरन बुलाया गया. बंबई पहुंचने से पहले ही पटेल उनके डिब्बे में घुसे. उन्होंने जिन्ना को चेतावनी दी कि बंबई के स्टेशन पर आपका स्वागत करने के लिए जो भीड़ जमा है, उसके बीच से होकर गुजरने की यदि आपने कोशिश की तो आप बीच में ही ढेर हो जाओगे.

डॉ. पटेल के सुझाव पर जिन्ना को बीच में ही एक छोटे से स्टेशन पर उतारकर सीधे अस्पताल पहुंचा दिया गया. इसी दौरान डॉ. पटेल को उस बात का पता चला जो भारत का सबसे गुप्त रहस्य बन गया था.

Source - Aaj Tak

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