अमेरिका-ईरान के बीच फंसा भारत, खेलेगा 'सेफ गेम'



अमेरिका के वॉकआउट के बाद ईरान न्यूक्लियर डील का भविष्य अधर में है। ऐसे में भारत एक बार फिर अपने उसी रुख को अपना सकता है जो इस डील के होने से पहले था यानी वह अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान के साथ व्यापारिक संबंध जारी रखेगा।

अपनी स्थिति सुरक्षित रखते हुए बुधवार को विदेश मंत्रालय ने कहा, 'भारत का हमेशा यही रुख रहा है कि ईरान परमाणु समझौते का मुद्दा शांतिपूर्ण वार्ता और कूटनीति से सुलझाया जा सकता है। जिसमें ईरान के शांतिपूर्वक परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल के अधिकारों का सम्मान हो और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं का भी समाधान हो। जॉइंट कॉम्प्रिहेन्सिव प्लैन ऑफ ऐक्शन (ईरान डील) को लेकर उठे सवालों को सुलझाने के लिए सभी पक्षों को मिलकर बात करनी चाहिए।' 

बता दें कि साल 2015 में जब ईरान डील पर हस्ताक्षर हुए थे, उस समय भारत सबसे ज्यादा राहत पाने वाले देशों में से एक था। पीएम मोदी ने इस डील को कूटनीति और सशक्तता की जीत बताया था। इस साल ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी की भारत यात्रा के दौरान भी दोनों देशों के संयुक्त बयान में भारत ने अपना समर्थन जाहिर करते हुए इस डील को परमाणु अप्रसार, अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण योगदान बताया था। 

साल 2011 में भारत के ऊपर अमेरिकी दबाव बहुत ज्यादा था, जिसकी वजह से तेल निर्यातक देशों में सबसे ऊपर रहने वाले ईरान की जगह इराक और सऊदी अरब भारत के सबसे बड़े तेल निर्यातक बन गए। हालांकि, साल 2018 में भारत ने ईरान से कुल तेल खरीदी को बढ़ाने का वादा किया, लेकिन अब इस वादे पर असर पड़ सकता है। 

पहले दौर के प्रतिबंधों के वक्त भारत ने ईरान के साथ एक वैकल्पिक प्रणाली तैयार की जिससे कि अमेरिका के साथ संबंध भी मधुर रहें। इस दौरान भारत ने भुगतान के लिए UCO बैंक का इस्तेमाल किया। अधिकारियों ने बताया कि इस बार भी यही प्रक्रिया दोहराई जा सकती है। 

इस बार अमेरिकी दबाव भी कमजोर होगा। साल 2011-12 में प्रतिबंधों को लागू करने के लिए P5+1 देश एक साथ दबाव बना रहे थे। इस बार, यूरोपियन देश इस डील को खत्म करने के पक्ष में नहीं है, जिसका मतलब हुआ कि भारत के पास ऐसे कई देशों का साथ होगा जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान संग काम करने के इच्छुक होंगे। फ्रांस, यूके, और जर्मनी ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस समझौते को बरकरार रखेंगे। चीन और रूस भी समझौते के पक्ष में हैं। 

चाबहार पोर्ट बढ़ाएगा भारत की चिंता? 

अमेरिका की ओर से 90 और 180 दिनों की छूट का अर्थ होगा कि कई देशों के पास ईरान में अपना संचालन बंद करने के लिए समय है। भारत के लिए यहां चाबहार पोर्ट सबसे बड़ी परेशानी हो सकता है जो कि पाक जाए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए सबसे अहम माना जा रहा है। इससे पहले लगे प्रतिबंधों के समय भारत और अफगानिस्तान ने चाबहार पर अमेरिका की छूट ले ली थी। भारत इस बार भी इसी तरह की छूट मिलने की उम्मीद कर रहा है। 

निजी सेक्टर के लिए होगी परेशानी 

भारत के प्राइवेट सेक्टर के लिए ईरान में निवेश करना मुश्किल हो सकता है। निवेश को सहायता देने के लिए रुपया-रियाल समझौता अभी भी लागू नहीं हो सका है। रूहानी की भारत यात्रा के दौरान ही यह समझौता भी हुआ था। 

भारत के लिए ये चिंताएं भी हैं मौजूद 

भारत के लिए सिर्फ अमेरिका के प्रतिबंध ही चिंता का विषय नहीं है। ईरान ने बीते कुछ सालों में अपनी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाए हैं। ईरान की आर्थिक स्थिति भी पहले से ज्यादा खस्ताहाल है। बीते कुछ सालों में ईरान ने सीरिया, यमन और ईराक में हो रहे संघर्षों पर ज्यादा पैसा खर्च किया है, जिसका परिणाम यह रहा कि देश में महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है। यही कारण है कि इसी साल की शुरुआत में देशभर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे। रूहानी सरकार पर हालांकि, इस डील को लेकर शायद ही घरेलू स्तर पर कोई दबाव बने लेकिन ईरान में कट्टरपंथियों के लिए अब बड़ी जगह बन सकती है। 

फिलहाल, भारत इस बात का इंतजार कर रहा है कि यह पूरी प्रक्रिया कैसा रूप लेती है।

Source -  Nav Bharat 

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