जिन्हें समलैंगिकता लीगल हो जाने पर मिर्ची लगी है, वो जरूर पढ़ें कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा



6 सितंबर, 2018 का दिन ऐतिहासिक है. लगभग 20 साल से मुखर तौर पर चल रही लड़ाई आज हमारा समलैंगिक समाज जीत गया है. अब इंडिया में समलैंगिकता लीगल है.

सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला 5 जजों की बेंच ने लिया. ये 5 जज हैं:

1. चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया दीपक मिश्रा 

2. जस्टिस इंदु मल्होत्रा 

3. जस्टिस रोहिंतन फली नरीमन 

4. जस्टिस एएम खानविलकर 

5. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

आइए जानते हैं कि इस ऐतिहासिक फैसले में जजों ने क्या कहा:

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने अपने और जस्टिस खानविलकर के लिए जजमेंट पढ़ा: सुरेश कुमार कौशल मामले में सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया स्वीकार्य नहीं है. एक संवैधानिक सोसाइटी होने का मुख्य लक्ष्य ही यही है कि समाज को प्रोग्रेसिव तरीके से बदला जाए. संविधान में दिए गए प्रोविज़न्स को शाब्दिक तौर पर नहीं लेना चाहिए. किसी भी व्यक्ति का सेक्सुअल ओरिएंटेशन प्राकृतिक है और उसके आधार पर भेद भाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है.

IPC के इस प्रोविज़न के परिणामस्वरूप LGBT लोगों के बीच सहमति से किया गया सेक्स भी अपराध बना दिया गया है और ये आर्टिकल 14 का उल्लंघन करता है. IPC का सेक्शन 377 पुरुष और पुरुष, पुरुष और स्त्री, स्त्री और स्त्री के बीच सहमति से किये गए सेक्सुअल एक्ट्स को अपराध करार देता है, इस वजह से असंवैधानिक है और इसे खत्म किया जाता है. जानवरों के साथ सेक्स अपराध बना रहेगा. सुरेश कुमार कौशल मामले में दी गई जजमेंट अमान्य करार दी जाती है

जस्टिस रोहिंतन नरीमन: NALSA जजमेंट और पुत्तुस्वामी जजमेंट ने कौशल वाले मामले को निरस्त करने में मदद की. लोगों के प्राइवेट एक्ट कानून के दायरे में नहीं आते. मेंटल हेल्थकेयर एक्ट पर बात हुई है और यह संसद के द्वारा भी माना गया है कि समलैंगिकता कोई दिमागी बीमारी नहीं है. समलैंगिकों को सम्मान से जीने का अधिकार है. सेम सेक्स सम्बन्ध को अपराध बनाने वाला सेक्शन 377 ख़त्म किया जाता है.

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़: गे, लेस्बियन, बाई सेक्सुअल और ट्रांसजेंडर्स के अधिकार दूसरे नागरिकों जितने ही बराबर हैं. ये केस सिर्फ एक प्रोविजन को गैर-अपराधिक घोषित करने के बारे में नहीं है. ये उस आकांक्षा के बारे में है जहां LGBT समुदाय के लोगों के संवैधानिक अधिकार और उनका अस्तित्व बाकी नागरिकों जैसा बनाया जा सके.



LGBT समुदाय को अपनी सेक्सुअल ओरिएंटेशन के अधिकार से वंचित करना उन्हें उनकी नागरिकता से वंचित करने जैसा है और उनकी निजता का हनन भी. दमनकारी औपनिवेशिक कानून के द्वारा उन्हें अंधेरे में नहीं धकेला जा सकता. इतिहास का इस्तेमाल करके किसी गलती को सुधारा नहीं जा सकता. लेकिन हम भविष्य के लिए रास्ता तय कर सकते हैं. इस केस में समलैंगिकता को डीक्रिमिनलाइज़ करने से भी काफी ज्यादा चीज़ें इन्वोल्व हैं. ये लोगों के सम्मान के साथ जीने के बारे में है.

नैचरल क्या है और अननैचरल क्या है? ये सवाल कौन तय करता है? लोगों ने भेदभाव के एक लम्बे इतिहास को चुनौती दी है, इसमें सुधार की मांग की है. विदेशी कानूनों ने भी LGBT समुदाय के अधिकारों को मान्यता दी है. हमें भी ये अधिकार देने चाहिए. डीक्रिमिनलाइज़ करना तो पहला कदम है. संवैधानिक नैतिकता सेक्शन 377 की वैधता तय करेगी, सामाजिक नैतिकता नहीं. सेक्शन 377 असंवैधानिक है. LGBT समुदाय के पास संविधान के तहत पूरे अधिकार हैं.नैचरल क्या है और अननैचरल क्या है? ये सवाल कौन तय करता है? लोगों ने भेदभाव के एक लम्बे इतिहास को चुनौती दी है, इसमें सुधार की मांग की है. विदेशी कानूनों ने भी LGBT समुदाय के अधिकारों को मान्यता दी है. हमें भी ये अधिकार देने चाहिए. डीक्रिमिनलाइज़ करना तो पहला कदम है. संवैधानिक नैतिकता सेक्शन 377 की वैधता तय करेगी, सामाजिक नैतिकता नहीं. सेक्शन 377 असंवैधानिक है. LGBT समुदाय के पास संविधान के तहत पूरे अधिकार हैं.

जस्टिस इंदु मल्होत्रा: इतिहास इन लोगों और उनके परिवारों का क्षमाप्रार्थी है. समलैंगिकता मानव की सेक्सुअलिटी का हिस्सा है. उन्हें सम्मान का और भेदभाव से छूट का अधिकार है. वयस्कों के बीच सहमति से बनाये गए संबंधों की इजाज़त है LGBT समुदाय को.

Source - On India


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