ये हैं वो सात वजह जो साबित करती हैं कि समलैंगिकता अपराध नहीं



उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण इससे भेदभाव होता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय को अन्य नागरिकों की तरह समान मानवीय और मौलिक अधिकार हैं। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपनी और न्यायाधीश ए एम खानविलकर ओर से कहा कि खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाना मरने के समान है।


उच्चतम न्यायालय ने धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त किया है, क्योंकि इससे समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पशुओं और बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन क्रिया से संबंधित धारा 377 का हिस्सा पहले की तरह अपराध की श्रेणी में ही रखा गया है। यही नहीं पशुओं के साथ किसी तरह की यौन क्रिया भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत दंडनीय अपराध बनी रहेगी। 

उच्चतम न्यायालय ने यौन रुझान को जैविक स्थिति बताते हुए कहा कि इस आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और जहां तक किसी निजी स्थान पर आपसी सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का सवाल है तो ना यह हानिकारक है और ना ही समाज के लिए संक्रामक है। यही नहीं फैसला पढ़ते हुए न्यायाधीश नरीमन ने कहा सरकार, मीडिया को उच्चतम न्यायलय के फैसले का व्यापक प्रचार करना चाहिए ताकि एलजीबीटीक्यू समुदाय को भेदभाव का सामना न करना पड़े। 



कोर्ट का फैसला आते ही एलजीबीटी समुदाय में खुशी की लहर दौड़ गई है। चेन्नई, मुंबई और देश के कोने- कोने से एलजीबीटी समुदाय के लोगों में खुशी के मारे रोने लगे वहीं कुछ जगह पर लोग अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाए है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए होमोसेक्सुएलिटी यानि समलैंगिकता को क्रिमिनल एक्ट बता चुका था जिसको दोबारा चुनौती देते हुए क्युरिटिव पिटिशन दाखिल की गई थी। 

बता दें कि कई वर्षों से समुदाय इसे अपराध की श्रेणी में रखे जाने का विरोध करता आ रहा था। जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मुहर लगा दी है कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। समलैंगिक यौन संबंधों का मुद्दा पहली बार गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन ने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में उठाया था। उच्च न्यायालय ने 2009 में अपने फैसले में धारा 377 के प्रावधान को गैरकानूनी करार देते हुये ऐसे रिश्तों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले को 2013 में उच्चतम न्यायालय ने पलट दिया था।

इसके बाद शीर्ष अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिका भी खारिज कर दी थी। हालांकि, शीर्ष अदालत में इस फैसले को लेकर दायर सुधारात्मक याचिकायें अभी भी लंबित हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है।

आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है।

Source - Amar Ujala 


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