“क्यों सेना के जवानों के बदले आम लोग ही फेसबुकिया युद्ध छेड़े बैठे हैं?”

“क्यों सेना के जवानों के बदले आम लोग ही फेसबुकिया युद्ध छेड़े बैठे हैं?”

14 फरवरी को हुआ पुलवामा हमला और उसके बाद दोनों तरफ से हुए हवाई हमलों के बाद सोशल मीडिया पर तो जंग छेड़ी जा चुकी है। टनों के हिसाब से शाब्दिक बम गिराए जा रहे हैं। फेसबुक यूज़र्स के कमेंट्स में लिखे शब्दों की अगर कल्पना करें तो बॉर्डर फिल्म का चीखता-चिल्लाता सनी देओल आपको दिख जायेगा।
लेकिन ऐसा क्यों है कि सेना के जवानों से ज़्यादा आम लोग ही फेसबुकिया युद्ध छेड़े बैठे हैं। क्यों सेना के किसी बड़े अधिकारी का हमें ऐसे खून खौला देने वाला, जोश से भर देने वाला, मरने मारने पर उतारू होने वाले बयान देखने को नहीं मिलता। क्या वो फेसबुक के योद्धाओं से कम बहादुर हैं? जवाब है नहीं।
बड़ा आसान है अपने घर में बैठकर युद्ध की मांग करना

अपने घरों में सुरक्षित बैठ अपने महंगे टी.वी सेट्स पर न्यूज़ देख किसी और को युद्ध के लिए कहना दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक है। इस काम में दूर-दूर तक कोई खतरा नहीं रहता है। बस फ्री डेटा का इस्तेमाल कर कुछ टाइप ही तो करने होते हैं।
बस इस बात की चिंता बनी रहती है कि कोई दूसरा उनसे ज़्यादा द्वेष, घृणा, हिंसा से भरे शब्द शेयर ना कर दे, क्योंकि वर्तमान समय में सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण ही तो देशभक्ति का पैमाना तय करता है। कम से कम फेसबुकिया वीर योद्धाओं का तो यही मानना है।
युद्ध कितना बदसूरत होता है यह फेसबुक के वीर योद्धाओं की सोच से परे है, इसीलिए जब युद्ध के माहौल को गर्म करने की बात आती है तो उनकी भागीदारी को भी नाकारा नहीं जा सकता। युद्ध के नतीजे क्या हो सकते हैं यह एक सिपाही का परिवार सबसे बेहतर जानता होगा इसलिए कारगिल युद्ध के शहीद की बेटी गुरमेहर कौर, जब दो देशों के बीच शांति की बात करती है तो यह बात युद्ध प्रेमियों को इस हद तक नागवार गुज़रती है कि उसे शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाता है।
सोशल मीडिया पर हर वक्त युद्ध की वकालत करने वालों में कोई अकाउंटेंट, मैनेजर, क्लर्क कोई किराने की दुकान चलाने वाला तो कोई छात्र जीवन का आनंद ले रहा होगा। सबने अपने-अपने सुरक्षित स्थानों से 30 सेकंड का बहुमूल्य समय निकालकर कमेंट करने का यह साहसी कार्य किया होगा।
युद्ध के खिलाफ बात करने वाला पाकिस्तान का हमदर्द

पहली नज़र में मैं या मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति जो युद्ध से ज़्यादा उससे होने वाले विध्वंश की बात करता है, पाकिस्तान का हमदर्द नज़र आ सकता है। जब आप अपने दिमाग को थोड़ी छूट देंगे और युद्ध से होने वाले परिणामों के बारे में सोचेंगे तो शायद आप भी मेरी ही तरह पाकिस्तान के हमदर्द बन जाएंगे जो कि मैं नहीं हूं और ना ही आप।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति में हर ज़िंदा इंसान को दुश्मन मान लिया जाता है और उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं। फिर वह चाहे जंग की खबरों से अंजान जंगल में लड़कियां बटोर रहा कोई आदिवासी ही क्यों ना हो, वह भी इस युद्ध का हिस्सा बन जाता है, जिसकी पहली प्राथमिकता उस रात के लिए अपने घर में आग जलाने की होगी।
युद्ध के दंश से कोई अछूता नहीं बचता, क्योंकि दोनों ही तरफ से गिरने वाले बम ना किसी बच्चे की उम्र देखते हैं ना किसी बूढ़े की लाठी, जिसके सहारे वह युद्ध प्रभावित क्षेत्र से भागकर अपनी जान बचा सके।
मैं युद्ध में मारे गए सैनिकों को शहीद से ज़्यादा पीड़ित मानता हूं, क्योंकि सैनिक पेंशन के पैसों के लिए मरना नहीं चाहता ना ही किसी और को मारने के लिए मरना चाहता है। वह भी जीना चाहता है बिल्कुल हमारी और आपकी तरह। वह शादी करता है, पैसे बचाता है, अपने बच्चों को छात्र जीवन का सुख देना चाहता है, अपने छोटे भाई को इस बेरोज़गारी के दौर में किसी सरकारी विभाग में कम से कम क्लर्क की नौकरी मिल जाए इसकी कामना करता है और हो सके तो रिटायरमेंट के बाद एक किराने की दुकान खोलकर बाकि बची ज़िन्दगी को पूरी तरह जी के किसी आम इंसान की तरह मरना चाहता है।
किसी सैनिक की ज़िन्दगी चैनल की TRP से ज़्यादा कीमती होती है

हमें उन पर गर्व हो इसके लिए हमें उनके प्राणों की आहूति देने से बचना चाहिए, क्योंकि आपके देश का सिपाही मरे, तो उस पर होने वाले गर्व का आनंद लेने के लिए आप तो जीवित रहते हैं मगर वह नहीं। ठीक इसी प्रकार भारतीय मीडिया भी लोगों की पसंद को ध्यान में रखते हुए ठंडी के दिनों में भी लोगों के खून में गर्मी लाने का कोई मौका नहीं छोड़ता, बिना यह सोचे कि किसी सैनिक की ज़िन्दगी या किसी की भी ज़िन्दगी उनके चैनल की TRP से ज़्यादा कीमती होती है।
फिर भी आपका मन करता है कि जंग होनी चाहिए, क्योंकि आपको पता होता है कि आपकी ख्वाहिश को पूरा करने में जो मरने वाला होगा, वो मैं नहीं हूं। शायद तब भी आप अपने सोफे पर बैठकर चाय और पकौड़े के साथ कोई अगला पोस्ट डाल रहे होंगे। मैं ऐसी सोच की मुखालफत करता हूं क्योंकि मुझे नहीं पसंद कि किसी और की सनक का शिकार पूरी आवाम हो जाए, मुझे नहीं पसंद की घरों की दीवारों पर गोलियों के बदसूरत निशान और टूटी छत हो, मुझे ऐतराज़ है कि किसी 25-26 साल के नौवजवान के नाम के आगे शहीद लग जाए।
युद्ध और नफरत नशे के सामान होते हैं, दोनों ही देशों में युद्ध की लालसा रखने वाले लोगों को मैं नशेड़ियों की संज्ञा देना चाहूंगा और देश भी नशेड़ियों की मर्ज़ी से नहीं चलने चाहिए।
देश प्रेम दिखाने के लिए युद्ध की वकालत करना एक बेहद की ओछा, सस्ता और आसान तरीका होता है। कई बार सरकारें ऐसी आतंकी घटनाओं का फायदा उठा देश में युद्ध का छिछला माहौल तैयार करने की कोशिश करती हैं ताकि जनता का ध्यान अपने निकम्मेपन या अपने ऊपर लगे आरोपों से भटका सके, क्योंकि उस समय लोगों में राष्ट्रवाद की भावना सबसे प्रबल होती है। अंत में इन हालातों में मुझे राहत इंदौरी का एक मशहूर शेर याद आता है
सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या, और खौफ बिखरा है दोनों समतो में, तीसरी समत का दबाव है क्या।
Source - Yooth Ki Awaaj

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